दशलक्षण पर्व आध्यात्मिक पर्व है। यह आत्मा के लक्षणों से परिचित कराने का पर्व है। इस पर्व के आते ही 8 साल के बच्चे से लेकर 80 साल के बुजुर्ग के हृदय में पूजन, अभिषेक, उपवासादि के प्रति उत्साह होता है। यह पर्व त्याग, संयम, तप, जाप, ध्यान, वैराग्य को बढ़ाने वाला है। पढ़िए अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज का विशेष आलेख…
पर्व दो प्रकार के होते हैं। 1. तात्कालिक 2. त्रैकालिक। तात्कालिक पर्व व्यक्ति विशेष या घटना विशेष से संबंधित होते हैं। त्रैकालिक शाश्वत पर्व न तो किसी व्यक्ति विशेष या घटना विशेष से संबंधित होता है, बल्कि इसका संबंध आध्यात्मिक भावों से है। पर्यूषण पर्वत्रैकालिक शाश्वत पर्व है। इस पर्व का दूसरा नाम दशलक्षण महापर्व भी है।
‘परि समन्तात् ऊषन्ते दह्यन्ते पापकर्माणि यस्मिन् तत् पर्यूषणम्’
अर्थात जो सर्वत: पापकर्मों को जलाता है, पाप क्षय कर आत्म धर्मों को उद्घाटित करता है, आत्म गुणों को प्रकट करता है उसे पर्यूषण कहते हैं। पर्व का अर्थ गांठ ग्रंथि। जो कषाय, मोह आदि रूपी गांठ को खुलने की कला सिखाता है उसे पर्यूषण पर्व कहते हैं। ‘उत्तमखमादिदासवीहो धम्मो’ उत्तम क्षमा आदि दस धर्म है।
10 दिनों तक धर्म के 10 लक्षणों की चर्चा होती इसलिए इसे दशलक्षण पर्व कहते हैं। दशलक्षण पर्व आध्यात्मिक पर्व है। यह आत्मा के लक्षणों से परिचित कराने का पर्व है। इस पर्व के आते ही 8 साल के बच्चे से लेकर 80 साल के बुजुर्ग के हृदय में पूजन, अभिषेक, उपवासादि के प्रति उत्साह होता है। यह पर्व त्याग, संयम, तप,
जाप, ध्यान, वैराग्य को बढ़ाने वाला है। दशलक्षण पर्व शरीर को नहीं, आत्मा को संवारने का पर्व है। इंद्रियों को वश में करने का पर्व है। कर्म शत्रुओं पर विजय पाने के लिए ट्रेनिंग सेंटर हैं दशलक्षण पर्व। दशलक्षण पर्व श्रावकों के लिए मुनि धर्म समझने की पाठशाला के समान है। आत्म का अनुभव करवाने वाला है दशलक्षण पर्व। दशलक्षण पर्व दस दिन का होता है। दशलक्षण पर्व साल में तीन बार आता है पर भाद्रपद महीने में विशेष रूप से मनाया जाता है। दस दिन के बाद 11 वें दिन क्षमावाणी पर्व सामूहिक रूप से मनाया जाता है। साल में तीन बार आते हैं दशक्षण पर्व, पहला चैत्र शुक्ल 5 से 14 तक, दूसरा भाद्र शुक्ल 5 से 14 तक तथा तीसरा माघ शुक्ल 5 से 14 तक। इन तीनों के भाद्र पद में आने से दशलक्षण पर्व का विशेष महत्व है। भाद्रपद माह में आने वाले इस पर्व को श्रावक विशेष रूप से मनाते हैं। इस माह को धार्मिक माह भी कहा जाता है। भारतीय संस्कृति के अनेक धार्मिक पर्व इसी माह में आते हैं। इसी में से एक जैन धर्म का पर्व है दशलक्षण पर्व।
दशलक्षण पर्व का प्रारंभ
अनादिकाल से पृथ्वी क्षेत्र का समूचे ब्रह्मांड में धीरे-धीरे परिवर्तन होता रहता है और एक समय आता है कि पृथ्वी पूरी तरह नष्ट हो जाती है और पुनः धीरे-धीरे प्राकृतिक सौंदर्य लौटने लगता है। यह सब धर्म के अनुसार अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी काल के परिवर्तन के कारण होता है। सुख, आयु, कषाय आदि जिसमें कम होती है, उसे अवसर्पिणी काल और जिसमें यह बढ़ती है, उसे उत्सर्पिणी काल कहते हैं। इन दोनों के बीच के संक्रमण काल में 96 दिन होते हैं। यह सृष्टि के
नाश और रचना का मुख्य काल होता है। सात-सात दिन तक सात प्रकार की वर्षा होती है, जिनमें जहर, ठंडेपानी, धूम, धूल, पत्थर, अग्नि आदि की वर्षा भी शामिल होती है जिसके फलस्वरूप पूरी पृथ्वी नष्ट हो जाती है, सौंदर्य चला जाता है। इसके बाद प्राकृतिक सौंदर्य के लौटने के सात-सात दिन तक शीतल जल, अमृत, घी, दिव्य रस, दूध आदि की वर्षा होती है। इससे पृथ्वी हरी-भरी हो जाती है और चारों तरफ खुशी की लहर दौड़ पड़ती है। इस प्रकार 49 दिन तक कुवृष्टि और
49 दिन तक सुवृष्टि होती है । 49 दिन की सुवृष्टि का प्रारंभ श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी से होता है और वह भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तक होता है। उसके बाद जो 72 जोड़ेमनुष्य और तिर्यंचों के देवों और विद्याधरों ने विजयार्थपर्वत की गुफा में छिपाये थे उन्हें निकाला जाता है। वही जोड़े भाद्रपद शुक्ल पंचमी से 10 दिवसीय उत्सव मनाते हैं। उसे ही आज दशलक्षण पर्व के रूप में मनाया जाता है। दशलक्षण पर्वत्रैकालिक पर्व (अनादि निधन) है। इस पर्व
को मनाने के पीछे एक घटना है। यह घटना भी त्रैकालिक (अनादि निधन) है। जब-जब काल परिवर्तन होता है तब यह घटना घटती है। काल का परिवर्तन त्रैकालिक (अनादि काल) से होता आ रहा है। इसलिए दशलक्षण पर्वया अनादि पर्व कहते हैं।













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