आजकल के माता-पिता बच्चों को उच्चतम शिक्षा देने पर तो ध्यान देते हैं, लेकिन उनमें धार्मिक और संस्कार आधारित मूल्य स्थापित करने पर उतना ध्यान नहीं देते। बचपन में दिए गए सद्गुण और संस्कार, बुढ़ापे तक वैसे के वैसे बने रहते हैं। अगर बचपन में बच्चों को रोज मंदिर लेकर जाया जाता है, तो एक दिन जब आप वृद्ध हो जाएंगे, वे आपका हाथ पकड़कर तीर्थ वंदना के लिए ले जाएंगे। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…
कोटा। आजकल के माता-पिता बच्चों को उच्चतम शिक्षा देने पर तो ध्यान देते हैं, लेकिन उनमें धार्मिक और संस्कार आधारित मूल्य स्थापित करने पर उतना ध्यान नहीं देते। बचपन में दिए गए सद्गुण और संस्कार, बुढ़ापे तक वैसे के वैसे बने रहते हैं। अगर बचपन में बच्चों को रोज मंदिर लेकर जाया जाता है, तो एक दिन जब आप वृद्ध हो जाएंगे, वे आपका हाथ पकड़कर तीर्थ वंदना के लिए ले जाएंगे। लेकिन अफसोस यह है कि आजकल के माता-पिता बच्चों को उच्च शिक्षा दिलवाकर विदेशों में पैसे कमाने के लिए भेज देते हैं। वहीं, जब बच्चे बड़े होते हैं, तो वे अपने माता-पिता को “स्टूपिड” समझने लगते हैं और उन्हें “ओल्ड एज होम” भेज देते हैं। यह एक बेहद विचारणीय मुद्दा है।
कोटा के आर के पुरम निवासी, देव शास्त्र गुरु के परम भक्त और धर्मनिष्ठ विमल चंद जैन, जो 16 अगस्त 2022 को ब्रेन पैरालाइसिस से ग्रसित हो गए थे, उनके सुपुत्र पारस जैन पार्श्वमणि, जो पिछले 35 वर्षों से जैन समाज की पत्रकारिता के माध्यम से निस्वार्थ भाव से सेवा दे रहे हैं, ने अपने पिता की सेवा में दिन-रात एक कर दिया। पारस जैन और उनकी धर्मपत्नी सारिका जैन ने मिलकर विमल चंद जैन की सेवा की। उन्होंने अपने पिता को प्रतिदिन नित्य कर्म करवाए, उन्हें नहलाया और महामंत्र णमोकार, मेरी भावना, तत्वार्थ सूत्र, विनय पाठ, वैराग्य भावना, आलोचना पाठ और जैन भजन सुनाए। यह कार्य प्रतिदिन चलता रहा।
14 नवंबर 2024 को, चारों प्रकार के आहार का त्याग करते हुए, दोपहर 12:30 बजे, महामंत्र नमोकार और वैराग्य भावना सुनते हुए विमल चंद जैन का देहावसान हुआ। गौरतलब है कि राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा जी के नेतृत्व में, राजस्थान के इतिहास में पहली बार मुख्यमंत्री आवास पर परम पूज्य आचार्य 108 शशांक सागर जी महाराज और 13 दिगंबर और श्वेतांबर संतों की मंगलमय उपस्थिति में राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी पारस जैन पार्श्वमणि पत्रकार को वर्तमान का श्रमण कुमार और सारिका जैन को सतयुग की नारी का गौरव प्रदान करते हुए प्रशस्ति पत्र से सम्मानित किया गया। यह हमारे संपूर्ण भारत के जैन समाज के लिए एक गर्व की बात है।
अतः यही भावना है:
दिन-रात मेरे स्वामी में भावना यह भाऊ,
देहांत के समय में तुमको न भूल जाऊं।
मैत्री भाव जगत मेरा सब जीवों से नित्य रहे,
दिन हीन जीवों पर मेरे उर से करुणा स्तोत्र बहे।













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