पुरानी टोंक में चतुर्भुज तालाब के पास 1008 श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर में राजकीय अतिथि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सानिध्य में 7 से 12 नवंबर तक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा हो रही है। आर्यिका श्री महायशमति माताजी ने बताया कि पंच कल्याणक क्या है? क्यों मनाया जाता है? इसका उद्देश्य क्या है? इससे क्या धार्मिक लाभ होते हैं। टोंक से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…
टोंक। पुरानी टोंक में चतुर्भुज तालाब के पास 1008 श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर में राजकीय अतिथि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सानिध्य में 7 से 12 नवंबर तक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा हो रही है। पंच कल्याणक क्या है? क्यों मनाया जाता है? इसका उद्देश्य क्या है? इससे क्या धार्मिक लाभ होते हैं? इस बारे आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के संघ की आर्यिका श्री महायशमति माताजी ने बताया कि पंचकल्याणक प्रतिष्ठा कंकर को शंकर बनाने की प्रक्रिया है। इसमें पाषाण की प्रतिमा, रत्न की प्रतिमा, धातु की प्रतिमा में भगवान के गुणों का आरोपण कर उन्हें पूजनीय बनाया जाता है। पंच कल्याणक में प्रतिष्ठाचार्य के माध्यम से आचार्य भगवन प्रतिमाओं में सूरी मंत्र देकर उन्हें पूजनीय बनाते हैैं। भगवान के गर्भ कल्याणक, जन्म कल्याणक, तप-दीक्षा कल्याणक, केवलज्ञान कल्याणक और मोक्ष कल्याणक पांच कल्याणक होते हैं। वस्तुतः पंचकल्याणक में सभी क्रियाएं सौधर्म इंद्र तथा अन्य इंद्र द्वारा की जाती है। वर्तमान के पंचमकाल में प्रतिमाओं को भगवान बनाने के लिए नाटकीय रूप मानव में इंद्र और अन्य इंद्र बनाकर यह धार्मिक क्रियाएं करते हैं। भगवान श्री पार्श्वनाथ पर विगत 10 भवों जन्मों में अनेक उपसर्ग कमठ ने किए। अविचल साधना तप से केवल ज्ञान प्राप्त कर सभी 8 कर्मों का नाश कर मोक्ष जाते है।
गर्भ में आने पर 14 करोड़ रत्नों की वृष्टि
आर्यिका श्री ने बताया कि गर्भ कल्याणक के अंतर्गत जो तीर्थंकर माता के गर्भ में आने वाले होते हैं। उनके गर्भ में आने के 6 माह पूर्व से ही जन्म नगरी
में दिन में 4 बार 3ः 30 करोड़ कुल 14 करोड़ प्रतिदिन रत्नों की वर्षा देवों द्वारा की जाती है। तीर्थंकर माता 16 सपने देखते हैं। इन 16 सपने में एरावत हाथी, महा वृषभ सिंह, अभिषेक होती लक्ष्मी, दो मालाएं, चंद्रमा सूर्य, युगल मछली, सुगंधित जल भरे हुए कलश, जल से भरा सरोवर, लहरों वाला महासागर, सिंहासन, देव विमान, नागेंद्र भवन रत्न रश्मि, तथा निर्भूम अग्नि इस प्रकार सोलह सपने तीर्थंकर की माता को सपने में दिखाई देते हैं और जब अपने राजा पति से इसका अर्थ समझती है तब वह बताते हैं कि आप के गर्भ में तीर्थंकर भगवान का जन्म होना है, जो 8 कर्मों का नाश कर मोक्ष लक्ष्मी को प्राप्त कर सिद्धालय पर विराजित होंगे।
अष्ट और 56 कुमारियों द्वारा माता की सेवा
तीर्थंकर बालक के गर्भ में आने के पहले दिन से 56 कुमारी और अष्ट कुमारी माता की सेवा में 9 माह तक संलग्न रहती है। यह माता को स्नान कराना, श्रंगार कराना, रक्षा के साधन जुटाना वैय्यावृत्ति सेवा करना, धर्म चर्चा करना आदि कार्य करती है। जिससे माता को को कोई कष्ट नहीं हो और विचारों परिणाम में विशुद्धि बनी रहे।
तीर्थकर प्रभु का जन्म, 12 करोड़ वाद्य का वादन
9 माह पूर्ण होने पर तीर्थकर बालक का जन्म होता है। जन्म होते ही तीन लोक के प्राणियों को पल भर के लिए शांति का अनुभव होता है। देवताओं द्वारा 12ः30 करोड़ प्रकार के बाजे बजाए जाते हैं। सौधर्म इंद्र का आसन कंपायमान होता है और ध्यान लगाकर सौधर्म इंद्र यह जानते हैं कि अमुक नगरी में तीर्थंकर बालक का जन्म हुआ है, वह अपने सिंहासन से खड़े होकर सात कदम आगे चलकर स्वर्ग से तीर्थकर बालक को नमस्कार करता है। सौधर्म इंद्र सभी देव परिवार के साथ ऐरावत हाथी पर शचि इंद्राणी के साथ तीर्थकर बालक की जन्म नगरी की ओर प्रस्थान करता है।
तीन परिक्रमा शचि इंद्राणी प्रभु के दर्शन बाद दो भव अवतारी
सौधर्म इंद्र ऐरावत हाथी पर शचि इंद्राणी के साथ सवार होकर तीर्थंकर बालक का जन्म जिस नगरी में हुआ है उस नगर के तीन परिक्रमा लगाते हैं और शचि इंद्राणी प्रसुति गृह में जाती है। जहां तीर्थकर माता के पास मायावी बालक को सुलाकर तीर्थंकर बालक को अपनी गोद में लेकर बाहर आती है। तीर्थकर बालक के दिव्य मनोहर अलौकिक रूप को देखकर शचि इंद्राणी अत्यंत भाव विभोर होकर परिणाम में विशुद्धि बढ़ जाती है और संसार को केवल दो भव प्रमाण कर लेती है। वर्तमान भव सहित अर्थात तीर्थंकर बालक का दर्शन कितना पुण्यशाली होता है कि शचि इंद्राणी रानी एक भव अवतारी हो जाती है।
भगवान का जन्म अभिषेक
तीर्थकर बालक को सौधर्म इंद्र जब गोद में लेता है तो दो नेत्रों से उन्हें संतुष्टि नहीं मिलती तो वह अपने 1 हजार नेत्र लगाकर भगवान को निहारते हैं। तीर्थकर बालक को देखते हैं इसके बाद सौधर्म इंद्र शचि इंद्राणी के साथ ऐरावत हाथी पर तीर्थंकर बालक को लेकर जाते हैं रत्न सिहासन पर विराजमान कर क्षीरसागर से 1008 जल के घडो कलशों से भगवान का जन्म अभिषेक वैभव के साथ करते हैं। बालक के दाहिने पैर पर जो चिन्ह होता है वही तीर्थकर का लांछन होता है। तीर्थंकर बालक के जन्म अभिषेक के बाद सौधर्म इंद्र तीर्थकर बालक का नामकरण करते हैं।
8 वर्ष की उम्र में अणुवर्ती
8 वर्ष की आयु में तीर्थकर बालक अणुव्रत का पालन करने लग जाते हैं। क्रम से युवावस्था प्राप्त कर कुछ तीर्थकरों का विवाह भी होता है। तीर्थकर कुमार माता-पिता के इकलौते हैं। उनका राज्याभिषेक किया जाता है। संयोग पाकर वैराग्य का निमित्त मिलता है और वह वन की ओर प्रस्थान करते हैं। तीर्थकर स्वयं-भू होते हैं। अन्य किसी के संबोधन की आवश्यकता नहीं होती है। केवल सामान्य निमित्त पाकर वह वैराग्य को प्राप्त करते हैं तीर्थंकर सम्मेद दृष्टि होते हैं तत्वों का यथार्थ चिंतन करते हैं।
तीर्थकर बालक माता-पिता की इकलौती संतान
तीर्थकर बालक अपने माता पिता की इकलौती संतान होते हैं। तीर्थकर बालक के जन्म होने के बाद माता पिता को अन्य कोई संतान नहीं होती है। तीर्थकर बालक के भोजन भोग उपयोग की सामग्री स्वर्ग से सौधर्म इंद्र भेजते हैं। तीर्थकर बालक के साथ बाल क्रीड़ा जो होती है वह स्वर्ग के देव आकर करते हैं।
पंचाश्चर्य- देवकृत रत्नवर्षा, पुष्पवर्षा, गंधोदकवृष्टि, शीतल मंद सुगंधित वायु प्रवाह, दुंदुभि बाजे और अहोदनं अहोदनं की ध्वनी यह पंचाश्चर्य वृष्टि तीर्थकर भगवंत एवं विशेष महामुनियों के आहार में देवों द्वारा की जाती है।













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