अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज के चातुर्मास धर्म प्रभावना रथ के दूसरे पड़ाव के दसवें दिन हाई लिंक सिटी में बड़ी भक्ति भाव से भक्तामर महामंडल विधान में 224 अर्घ्य चढ़ाए गए। इस अवसर पर मुनि श्री ने कहा कि जीवन बहुत छोटा है। उस छोटे से जीवन में हम बहुत कुछ करना भी चाहते हैं। याद रखना कि इस छोटे से जीवन में अगर कुछ करना है तो हमें अपने जीवन में उन आराध्य का प्रति समय स्मरण करना चाहिए जिन्होंने हमें जन्म दिया है। पढ़िए यह स्मिता लखावत की विशेष रिपोर्ट…
इंदौर। अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज के चातुर्मास धर्म प्रभावना रथ के दूसरे पड़ाव के दसवें दिन हाई लिंक सिटी में बड़ी भक्ति भाव से भक्तामर महामंडल विधान में 224 अर्घ्य चढ़ाए गए। महेंद्र पहाड़ियां ने बताया सर्वप्रथम जिनेंद्र भगवान के अभिषेक व शांति धारा का सौभाग्य आज के भक्तामर महामंडल विधान के पुण्यार्जक संजय, बरखा, यश, उमंग, कियान, पूरु बड़जात्या और राजेश ,मनीषा, निकिता, प्राची काला सुनेल वालों को प्राप्त हुआ।
तत्पश्चात नित्य नियम पूजन के साथ भक्तामर महामंडल विधान में आज कुल 38 काव्यों के साथ 2128 अर्घ्य समर्पित किए गए। आचार्य अभिनंदन महाराज के चित्र अनावरणकर्ता व दीप प्रज्वलनकर्ता व अंतर्मुखी परम पूज्य मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज के पाद प्रक्षालन व शास्त्र भेंट का सौभाग्य उमर महिला संकाय, संजय बरखा बड़जात्या, राजेश मनीषा सुनेल वालों को प्राप्त हुआ।
हर समय करें आराध्य का स्मरण
इस अवसर पर मुनि श्री ने कहा कि जीवन बहुत छोटा है। उस छोटे से जीवन में हम बहुत कुछ करना भी चाहते हैं। याद रखना कि इस छोटे से जीवन में अगर कुछ करना है तो हमें अपने जीवन में उन आराध्य का प्रति समय स्मरण करना चाहिए जिन्होंने हमें जन्म दिया है क्योंकि आचार्य भगवंत कहते हैं कि हमारे जीवन का अगर कोई प्रथम गुरु है तो माता-पिता हैं। उनके संस्कार, उनकी संस्कृति हमारे जीवन का भविष्य तय करती है कि हमें कैसे संस्कार प्राप्त होते हैं, हमारी क्या संस्कृति है।
ध्यान रखना, हमें छोटा से बड़ा करने में जो माता-पिता का भूमिका होती है, अगर उसका हम स्मरण करें तो सच कहूं इस दुनिया में उनसे बड़ा कोई हो ही नहीं सकता है।
हमारे आचार्य भगवंत हमेशा कहते हैं कि जीवन एक छोटी सी नैया है। इस नैया को पार माता और पिता ही लगा सकते हैं। स्मरण करना जीवन के वे कुछ क्षण, जब बहुत छोटे थे किसी बिस्तर में आपने लघु शंका कर ली हो, दीर्घ शंका कर ली हो।
मां ने उस गीले स्थान में से आपको उठा कर बगल में सूखे स्थान पर सुला लिया और स्वयं उस गीले स्थान पर सोने को तैयार भी हो जाती है। याद करना कि मां जिस दिन मां बन जाती है और प्रभु के दर्शन करने जाती है तो अपने लिए कुछ नहीं मांगती। बस अपनी उस संतान के लिए मांगती है कि कैसे न कैसे उसका जन्म निर्विघ्न-निर्बाध हो जाए। जब उसका जन्म हो जाता है और फिर वह जब भी मंदिर जाती है तो बस यही भावना करती है परमात्मा से कि मेरा बच्चा पढ़-लिखा करके बड़ा व्यक्ति बन जाए, इसको अच्छी लड़की मिल जाए।
इसका अच्छा परिवार चल जाए। शादी के बाद और शादी के पहले की जिंदगी को याद करना कि जब तक वह मां नहीं बनी थी, तब तक वह अपने हिसाब से घूमती थी, अपने हिसाब से खाती थी, अपने हिसाब से खेलती थी, अपने हिसाब से पहनती थी, पर जिस दिन मां बन जाती है, उसका खाना उसका बैठना-उठना सब बेटे के लिए हो जाता है।
जब बच्चा उसका कोख में पलता है, वह सब कुछ अपनी पसंद का खाना छोड़ देती है, केवल वही चीज खाती है जो गर्भस्थ शिशु के लिए अच्छी होती हैं क्योंकि उसे इस दुनिया में सबसे अधिक प्रेम अगर किसी से है तो अपने पुत्र से है, वह वात्सल्य का प्रतीक है।
विचार करना, जिस दिन बच्चे का जन्म होता है, स्त्री अपने पुत्र को जन्म देती है इससे बड़ा प्रेम वास्तव में क्या हो सकता है कि उसके स्तन में से अपने आप दूध झरने लगता है। कोई दवाई खाने की, कोई इंजेक्शन लगाने की जरूरत नहीं होती है। जिस दिन बच्चे का जन्म हुआ उसी क्षण से उसके स्तन से दूध निकलना प्रारंभ हो जाता है। इससे बड़ा वात्सल्य और प्रेम का क्या उदाहरण हमारे जीवन में हो सकता है।














Add Comment