अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज के धर्म प्रभावना रथ का पांचवां पड़ाव श्री 1008 पदम प्रभु दिगंबर जैन मंदिर, वैभव नगर में चल रहा है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत 12 दिवसीय वृहद भक्तामर महामंडल विधान का आयोजन किया जा रहा है। अब तक इस आयोजन में कुल 896 अर्घ्य समर्पित किए जा चुके हैं। इस अवसर पर अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने प्रवचन में कर्म की दस अवस्थाओं उपशम, उदय, बंध, सत्ता, संक्रमण, निधती, निकाचित, उदीराणा, अपकर्षण, और उत्कर्षण पर चर्चा की। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…
इंदौर। अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज के धर्म प्रभावना रथ का पांचवां पड़ाव श्री 1008 पदम प्रभु दिगंबर जैन मंदिर, वैभव नगर में चल रहा है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत 12 दिवसीय वृहद भक्तामर महामंडल विधान का आयोजन किया जा रहा है। विधान के चौथे दिन, मुख्य पुण्यार्जक पी.सी. सुषमा, राहुल, तृप्ति जैन परिवार और 12 दिवसीय सौधर्म इन्द्र संजय सीमा जैन ने भक्तामर काव्य के 13, 14, 15 और 16 काव्य की आराधना करते हुए कुल 224 अर्घ्य समर्पित किए।
अब तक इस आयोजन में कुल 896 अर्घ्य समर्पित किए जा चुके हैं। इस विशेष अवसर पर शान्तिधारा का लाभ कलाबाई सुशील जैन, शारदा, संजय, और विशाल काला को प्राप्त हुआ।
दीप प्रज्वलन, चित्रानावरण और मुनि श्री के पाद प्रक्षालन का लाभ पी.सी. सुषमा जैन परिवार को मिला। शास्त्र भेंट का लाभ उषा जैन और कल्पना जैन परिवार को मिला।
कर्म की होती हैं दस अवस्थाएं
इस अवसर पर अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने प्रवचन में कर्म की दस अवस्थाओं उपशम, उदय, बंध, सत्ता, संक्रमण, निधती, निकाचित, उदीराणा, अपकर्षण, और उत्कर्षण पर चर्चा की।
उन्होंने कहा कि मनुष्य की क्रिया, आचरण और व्यवहार के अनुसार कर्म उन अवस्थाओं को प्राप्त कर लेते हैं।
मुनि श्री ने बताया कि मनुष्य को निरंतर अपने कर्म पर ध्यान देना चाहिए और देव, शास्त्र, गुरु की सेवा में सदैव तत्पर रहना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि जीवन भर व्यक्ति को अपने कर्म को काटने के लिए पुरुषार्थ करते रहना चाहिए।
मुनि श्री ने समाज की स्थिति पर विचार करते हुए कहा कि आज हम देखते हैं कि मनुष्य किस प्रकार के दुखों को भोगता है।
भोग के साधन होते हैं, लेकिन भोग नहीं पाता। कई बार देखा गया है कि जिसके पास कुछ नहीं था, वह आज करोड़पति बनकर बैठा है।
उन्होंने कहा कि पुण्य में पाप कर्म करने वाले और पाप में पुण्य का संचय करने वाले लोग भी होते हैं।
इसलिए व्यक्ति को अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि कर्म की दस अवस्थाओं के कारण जीवन में परिवर्तन आता रहता है।













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