समाचार

ज्ञानतीर्थ पर धर्मसभा में बताया संगति का महत्व : दुष्ट व्यक्तियों से सदैव दूरी बनाकर रखना चाहिए -आचार्य ज्ञेयसागर


पढ़िए मनोज नायक की रिपोर्ट…


मुरैना। संसार में संगति का बहुत महत्व है। हमें संगति का सदैव ध्यान रखना चाहिए। जो मन, कार्य और बुद्धि से परम हंस हैं, उन्हें सदैव कोओं से दूरी बनाए रखना चाहिए। वेद पुराण और शास्त्रों में लिखा है कि दुष्ट व्यक्ति से हमेशा दूरी बनाकर रखो क्योंकि दुष्ट व्यक्ति आपको कभी भी संकट में डाल सकता है। ऐसे व्यक्तियों को कितने भी अच्छे माहौल में रखा जाए, वे सुधरने की चेष्टा नहीं करते। जैसी आपकी संगति होगी, वैसी आपकी नीयत होगी, वैसे ही आपके विचार होंगे। जैसे विचार होंगे, वैसा ही आपका व्यवहार होगा, वैसा ही आपका व्यक्तित्व होगा और उसी अनुरूप आपको जीवन में परिणामों की प्राप्ति होगी। उक्त विचार सप्तम पट्टाचार्य श्री ज्ञेयसागर जी महाराज ने ज्ञानतीर्थ जैन क्षेत्र में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।

उदाहरण से समझाया

पूज्य गुरुदेव संगति के संदर्भ में एक दृष्टांत सुनाते हुए कहा कि एक बार एक व्यक्ति जंगल से गुजर रहा था, थकान हुई और एक वृक्ष के नीचे आकर सो गया। वहां एक हंस आया और उस हंस ने देखा कि उस व्यक्ति के चेहरे पर धूप आ रही हैं तो ठीक से सो नहीं पा रहा हैं । हंस पेड़ की डाली पर अपने पंख खोल कर बैठ गया ताकि उसकी छांव में वह व्यक्ति आराम से सोए। जब वह सो रहा था तभी एक कौआ आकर उसी डाली पर बैठा और उसने व्यक्ति के ऊपर अपना मल विसर्जन किया और वहां से उड़ गया। तभी व्यक्ति की नींद खुल गई और गुस्से से यहां-वहाँं देखने लगा और उसकी नज़र हंस पर पड़ी और उसने तुरंत धनुष बाण निकाला और उस हंस पर तीर छोड़ दिया। हंस नीचे गिरा और मरते-मरते हंस ने कहा:- मैं तो आपकी सेवा कर रहा था, मैं तो आपको छांव दे रहा था, आपने मुझे ही मार दिया? इसमें मेरा क्या दोष था ? तब उस व्यक्ति ने कहा कि यद्यपि आपका जन्म उच्च परिवार में हुआ, आपकी सोच आपके तन की तरह ही सुंदर हैं, आपके संस्कार शुद्ध हैं, यहां तक कि आप अच्छे इरादे से मेरे लिए पेड़ की डाली पर बैठकर मेरी सेवा कर रहे थे, लेकिन आपसे एक गलती हो गयी, जब आपके पास कौआ आकर बैठा तो आपको उसी समय उड़ जाना चाहिए था। उस दुष्ट कौए के साथ एक घड़ी की संगत ने ही आपको मृत्यु के द्वार पर पहुंचाया है।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
4
+1
1
+1
0
Shreephal Jain News

You cannot copy content of this page