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श्री दिगंबर जैन सामाजिक संसद : एक समय का प्रभावशाली संगठन, अब खो रहा है पहचान


श्री दिगंबर जैन सामाजिक संसद कभी संस्था समाज के सामूहिक उत्थान का प्रतीक थी, परंतु आज यह व्यक्तिगत विचारों, स्वार्थों और राजनीति से प्रभावित होती दिख रही है। समाज की असली शक्ति मंदिर, साधु और परिवार की एकता में निहित है। नेतृत्व उसे मिलना चाहिए जो धर्म को राजनीति से ऊपर रखे, निःस्वार्थ भाव से कार्य करे और साधु-संयम पर विश्वास रखे। पढ़िए यह अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज का विशेष आलेख…


इंदौर। कभी समाज में अपनी विशिष्ट पहचान और प्रभाव के लिए प्रसिद्ध रही श्री दिगंबर जैन सामाजिक संसद, इंदौर का नाम आज धीरे-धीरे अपनी गरिमा और प्रभाव खोता जा रहा है। जिस संगठन की स्थापना समाज के सामूहिक उत्थान, एकता और धर्म के संरक्षण के उद्देश्य से की गई थी, वह आज व्यक्तिगत विचारों, आकांक्षाओं और महत्वाकांक्षाओं का केंद्र बनता दिखाई देता है।

व्यक्तिगत प्रतिष्ठा ओर अधिक सक्रिय 

समाज के विकास की दिशा में अग्रसर होने के बजाय अब कई लोग व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और आत्म-विकास की ओर अधिक सक्रिय नजर आते हैं। विचार रखना और अभिव्यक्ति करना हर व्यक्ति का अधिकार है, किंतु जब बात समाज और धर्म के हित की हो, तो व्यक्तिगत मतभेदों से ऊपर उठकर सामूहिक दृष्टि अपनाना अनिवार्य हो जाता है। यदि हम अपना घर सही ढंग से नहीं चला पा रहे, तो समाज जैसे व्यापक तंत्र के संचालन की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं?

साधुओं में रखें आस्था

समाज मंदिर, साधु और परिवार — इन तीन स्तंभों की एकता से ही निर्मित होता है। आज दुर्भाग्यवश, यही तीनों स्तंभ हमारे मतभेदों, प्रतिस्पर्धाओं और व्यक्तिगत स्वार्थों के कारण कमजोर पड़ते जा रहे हैं। धर्म के अनुसार, समाज का नेतृत्व उस व्यक्ति को मिलना चाहिए जो मंदिर की पीड़ा को समझ सके, साधुओं के गुणों में आस्था रखे, उनके आहार-विहार में सहभागी बने, और अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर समय व सेवा दे सके। समाज का मुखिया या प्रतिनिधि वह होना चाहिए जो धर्म को अपने व्यापार या राजनीति से ऊपर रखे; जो समाज, मंदिर और साधुओं के लिए निःस्वार्थ भाव से कार्य कर सके। राजनीति में उसकी भूमिका प्रभावशाली हो सकती है, परंतु राजनीति कभी उस पर प्रभावी नहीं होनी चाहिए।

इतिहास को रखें ध्यान

समाज, साधु और मंदिर की संस्कृति की सुरक्षा धन, पद या प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि विचार, कार्य, त्याग और समर्पण से होती है। जब धन, प्रभाव और राजनीतिक संबंध हमारे तीर्थों की रक्षा नहीं कर पाए, तो सामाजिक चुनावों में राजनीति का हस्तक्षेप क्यों किया जाए? गोमटगिरी, गिरनार और सम्मेदशिखर जैसे पवित्र स्थलों के उदाहरण हमारे सामने हैं — जहां आर्थिक शक्ति या राजनीतिक संपर्क भी धर्म की मूल भावना की रक्षा नहीं कर सके। इंदौर के कई अन्य धार्मिक स्थलों की स्थिति भी इसी चिंता की ओर संकेत करती है। इतिहास साक्षी है कि राजनीतिक दल हमेशा उसी व्यक्ति को आगे बढ़ाते हैं जिसका समाज में प्रभाव और स्वीकार्यता हो। फिर भी जब हम स्वयं को समाज की एकता के बजाय विभाजन के आधार पर परिभाषित करते हैं, तो हमारी सामूहिक शक्ति स्वतः क्षीण होती चली जाती है।

पहचानें संगठन की शक्ति

आज सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की है कि जो व्यक्ति समाज की पीड़ा को समझने की संवेदना नहीं रखता, जिसके पास समाज के लिए समय नहीं है, वह समाज की राजनीति से दूर रहे। क्योंकि जब संवेदना ही अनुपस्थित हो, तो समाज, मंदिर और साधुओं की रक्षा की भावना कहां से उत्पन्न होगी? अतः पद प्राप्त करना नहीं, बल्कि उस पद की जिम्मेदारी को समझना और उसे निभाना ही सच्ची सेवा है। समाज की शक्ति उसके संगठन, समर्पण और संयम में निहित है — न कि पद, प्रभाव या राजनीति में। यह आलेख लिखने की पीछी यही भाव था कि कही दिनों से कुछ व्यक्ति पुछ रहे थे कैसा होना चाहिए अध्यक्ष और  मुझे ऐसा लगता है कि हम अपने धर्म की गरिमा खोते जा रहे और सामाजिक स्तर,राजनीतिक स्तर आदि पर कमजोर होते जा रहे ,इस बात का   दर्द भी है मन में । 

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