आचार्यश्री विशुद्धसागर जी महाराज का 18 दिसंबर बुधवार को अवतरण दिवस है। इस विशेष अवसर पर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को परम श्रद्धा से याद किया जा रहा है। जैन धर्म के इस विलक्षण आचार्यश्री के तप, साधना और चर्या आदि की अनुमोदना की गई है। पढ़िए इंदौर से डॉ. जैनेंद्र जैन-राजेश जैन दद्दू की यह खास रिपोर्ट…
इंदौर। 18 दिसंबर 1971 को मध्यप्रदेश के भिंड जिले के ग्राम रूर में जन्मे ‘राजेंद्र’ ने मात्र 17 वर्ष की आयु में ही जगत के राग रंग से वैराग्य धारण कर गृह त्याग कर दिया था और गणाचार्यश्री विरागसागरजी महाराज से दीक्षा ग्रहण की थी। जो आज वीतरागता से विभूषित आध्यात्म रत्नाकर आचार्यश्री विशुद्धसागर जी के नाम से देशभर में विख्यात हैं। वे बहुआदरित एवं अद्भुत और अनूठे संत हैं। अपनी आगम अनुकूल चर्या और ज्ञान से नमोस्तु शासन को जयवंत कर रहे हैं। आचार्यश्री विशुद्धसागर जी वर्तमान में अपने ज्ञान, अपनी आगम अनुकूल विशुद्ध चर्या और आगम सम्मत पीयूष वर्षिणी विशुद्ध वाणी के प्रभाव से आध्यात्म सरोवर के राजहंस एवं आध्यात्म रत्नाकर धरती के देवता सिद्ध हो चुके हैं और श्रमण संस्कृति के श्रेष्ठ और गौरवमयी संतों की श्रृंखला में चर्या शिरोमणि, आध्यात्मिक योगी आचार्यश्री विशुद्धसागर जी के रूप में स्थापित हैं।
चर्या में आगम की दिखाई देती है झलक
इस पंचमकाल में अनेक जैन मुनि, आचार्य एवं उनके संघ साधनारत हैं और हर संघ की अपनी चर्या है लेकिन, वर्तमान में उनकी चर्या एवं कृतित्व में 20वीं सदी का प्रभाव भी दिखाई देता है लेकिन, आचार्य विशुद्धसागर जी एवं उनसे दीक्षित 56 मुनियों का संघ इसका अपवाद है। उनकी चर्या में सिर्फ और सिर्फ आगम की झलक दिखाई देती है और शिथिलाचार का कोई स्थान नहीं है। देश में कहीं भी उनके नाम से कोई प्रोजेक्ट भी नहीं है। इसलिए वह न धन संग्रह (चंदा) करते हैं, ना करवाते हैं। यही वजह है कि आज उनकी चर्या श्रावकों के लिए आदर्श एवं श्रमणों के लिए अनुकरणीय है।
एक लाख किमी विहार कर धर्म प्रभावना बिखेरी
आचार्य श्री का जितना विशद व्यक्तित्व है उससे अधिक उनका कृतित्व है। देश के 12 राज्यों में 1 लाख किमी से अधिक पदत्राण विहीन चरणों से पग विहार करते हुए धर्म और आध्यात्म में पगी अपनी पियूष वर्षिणी देशना के माध्यम से जगत कल्याणी जिनेंद्र की
वाणी को जन-जन तक पहुंचा रहे हैं। मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तरप्रदेश शासन ने अपने राज्यों में विहार के दौरान आचार्यश्री को राजकीय अतिथि का सम्मान प्रदान किया है।
145 से अधिक जिनबिम्ब पंचकल्याणक किए
आपके सानिध्य में अभी तक 145 से अधिक जिनबिम्ब पंचकल्याणक प्रतिष्ठाओं का संपन्न होना एक ऐसी उपलब्धि है। जो आपकी अरिहंत भक्ति का अभिज्ञान कराती है। इस उपलब्धि को यूएसए बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज किया गया है।
अमेरिका ने प्रदान की डीलिट की उपाधि
आपके द्वारा अभी तक 56 मुनि दीक्षाएं एवं 9 क्षुल्लक दीक्षाएं भी प्रदान की जा चुकी है। सभी दीक्षार्थी उच्च शिक्षित युवा है। आपने अभी तक 200 से अधिक कृतियों का सृजन किया है। जिनका देश-दुनिया में सबसे ज्यादा स्वाध्याय किया जा रहा है। आपके द्वारा रचित कृति ‘वस्तुत्व महाकाव्य’ एवं केसर से रचित कृति ‘कर्म विपाक’ का उल्लेख गोल्डन बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज है। ब्रिटिश नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ क्वीनमेरी अमेरिका द्वारा आपको डीलिट की मानद उपाधि प्रदान भी की गई है।
दीक्षा गुरु श्रीविरागसागरजी ने पट्टाचार्य पद सौंपा
आचार्य श्री विशुद्धसागर जी के दीक्षा गुरु समाधिष्थ गणाचार्य विराग सागर जी महाराज द्वारा अपनी समाधि के पूर्व 3 जुलाई 2024 को अपना पट्टाचार्य पद देने की घोषणा की थी। पट्टाचार्य पद समारोह 500 मुनियों के सानिध्य और लाखों लोगों की उपस्थिति में आगामी अप्रैल माह में इंदौर के नवोदित तीर्थ सुमति धाम में संपन्न होगा। पट्टाचार्य विशुद्धसागर जी महाराज के अवतरण दिवस पर उनके चरणों में कोटि-कोटि नमन।













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