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दोहों का रहस्य -109 प्रेम, श्रद्धा, करुणा और आत्मज्ञान से ही ईश्वर को अनुभव कर सकते हैं : अपने भीतर को सींचो, सजग बनो, नम्र रहो 


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 109वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


हरिया जाने रुखड़ा, उस पानी का नेह।

सुखा काठ न जानई, कबहूं बरसे मेह।।


इस दोहे में संत कबीर दास ने प्रकृति के प्रतीकों के माध्यम से मानव चेतना की स्थिति को दर्शाया है।

“हरिया जाने रुखड़ा” —

हरा-भरा वृक्ष उस जल का आभारी है, जिसकी नमी से उसमें जीवन है। यह वृक्ष चेतना, संवेदनशीलता और भक्ति का प्रतीक है। जिस व्यक्ति का हृदय निर्मल, कोमल और खुला होता है, वह अपने जीवन में आए प्रेम, कृपा, ज्ञान और अनुभव को पहचानता है, उन्हें आदरपूर्वक आत्मसात करता है।

“उस पानी का नेह” —

‘पानी का नेह’ अर्थात वह आत्मिक स्निग्धता, जो भीतर से पोषण देती है। यह ईश्वर की कृपा, गुरु की दीक्षा, या जीवन में प्राप्त आत्मबोध भी हो सकता है। संवेदनशील व्यक्ति इस ‘नेह’ को महसूस करता है और सहेजकर रखता है।

“सुखा काठ न जानई” —

लेकिन जिसका अंत:करण शुष्क है, जिसमें प्रेम, करुणा और श्रद्धा का अभाव है — वह इस दिव्यता को पहचान ही नहीं पाता। ऐसा व्यक्ति कठोर हृदय वाला होता है, जिस पर जीवन की वर्षा (ज्ञान, अनुभव, अवसर, प्रेम) का कोई असर नहीं होता।

“कबहूं बरसे मेह” —

कबीर कहते हैं कि जैसे सूखी लकड़ी को यह आभास नहीं होता कि कभी बारिश हुई थी, वैसे ही कठोर हृदय वाला व्यक्ति यह समझ ही नहीं पाता कि उसके जीवन में भी कभी दिव्यता या सत्संग का अवसर आया था।

संदेश:

यदि हम भीतर से संवेदनशील हैं — प्रेम, श्रद्धा, करुणा और आत्मज्ञान के लिए खुले हैं — तभी हम जीवन, ईश्वर और संबंधों को सच में अनुभव कर सकते हैं। अन्यथा हम एक सूखी लकड़ी की तरह रह जाएंगे, जिस पर न कोई भावनात्मक असर होगा, न आध्यात्मिक।

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