दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 124वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…
“कबीर यह जग कुछ नहीं, खिन खारा मीट।
कालह जो बैठा भंडपे, आज भसा ने दीठ॥”
कबीर इस दोहे में संसार की क्षणभंगुरता और जीवन की नश्वरता की ओर इशारा करते हैं। वे कहते हैं कि यह संसार वास्तव में कुछ भी नहीं — एक क्षण में यह नमक जैसा खारा (कष्टदायक) लग सकता है, और अगले ही क्षण मीठा (सुखद)।
अर्थात्, परिस्थितियां निरंतर बदलती रहती हैं, इसलिए इस संसार के सुख-दुख, मान-अपमान या हानि-लाभ से अत्यधिक जुड़ाव व्यर्थ है।
यहां “कालह” का अर्थ है काल यानी समय — जो सभी पर समान रूप से शासन करता है।
जो व्यक्ति कल तक किसी ऊंचे आसन पर बैठा था, जैसे कि किसी भंडारे में विशिष्ट सम्मान के साथ, वही आज काल की बाढ़ में बह गया।
समय किसी को नहीं बख्शता। वह राजा को रंक और रंक को राजा बना सकता है।
न पद, न प्रतिष्ठा, न धन, न जाति — कुछ भी समय की शक्ति के आगे स्थायी नहीं।
कबीर इस दोहे के माध्यम से यह स्पष्ट संदेश देते हैं कि —
यह संसार एक भ्रम है, और समय सबसे बड़ा सत्य।
इसलिए, जो व्यक्ति माया-मोह, अहंकार, और सामाजिक दिखावे से ऊपर उठकर ईश्वर की भक्ति और आत्मचिंतन में लगता है, वही सच्चे सुख और शांति को प्राप्त करता है।
“आज भसा ने दीठ” — यानी मृत्यु सदैव समीप है, और किसी भी क्षण हमें अपने साथ बहा ले जा सकती है।
इसलिए, जब तक चेतना है, तब तक सत्य, भक्ति, विनम्रता और आत्म-जागरण को जीवन में उतारना चाहिए।
यही मानव जीवन की सार्थकता है, और मुक्ति का सच्चा मार्ग भी।













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