4 से 12 अक्टूबर तक आठ दिवसीय श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान का आयोजन मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज एवं मुनि श्री संधानसागर जी महाराज ससंघ के सानिध्य में होगा। भोपाल से पढ़िए, यह खबर….
भोपाल (अवधपुरी)। 4 से 12 अक्टूबर तक आठ दिवसीय श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान का आयोजन मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज एवं मुनि श्री संधानसागर जी महाराज ससंघ के सानिध्य में होगा। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि 4 अक्टूबर को प्रातः घटयात्रा मुनिसंघ के सानिध्य में कार्यक्रम स्थल पर ध्वजारोहण मंडप उदघाटन एवं सकली करण की क्रियाएं होंगी। प्रतिदिन प्रातः6:30 बजे से भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा तत्पश्चात नित्यनियम पूजन एवं मुनि श्री के प्रवचन होकर 11 बजे तक विधान होगा।
मुनि श्री ने प्रातः धर्म सभा में णमोकार महामंत्र को ध्याओ के संदर्भ में विभिन्न तरीकों से ध्यान कराया तथा णमोकार महामंत्र का महत्व बताते हुए कहा कि यह पाप विनाशक, विघ्नविनाशक है तथा समस्त द्वादशांग जिनवाणी का सार एवं मुक्ति का आधार है। उन्होंने महामंत्र के चार चरण जप,ध्यान,साधना,और आराधना को बताते हुये कहा यह हमारे जीवन का सबसे बड़ा आधार, अशुभ को टालने वाला तथा समस्त अमंगल को हरने वाला है।
मंत्र जपी बनो मंत्र जीवी नहीं
उन्होंने निर्देश देते हुए कहा कि इस महामंत्र का प्रयोग दुनियादारी, प्रसिद्धि,गोरखधंधा तथा व्यापार व्यवसाय के लिये मत कीजिये। यह कर्मभूमि है,लोक जीवन के कार्य तो अपने पुरूषार्थ से ही करना चाहिये। उन्होंने कहा कि “मंत्र जपी बनो मंत्र जीवी नहीं” मंत्र की आराधना और साधना जन्म जरा मृत्यु से मुक्ती के लिये होना चाहिये। उन्होंने कहा कि किसान बीज इसलिये बोता है कि उसकी अच्छी फसल आ जाये। घासफूस तो फसल के साथ अपने आप आती है। उसी प्रकार मंत्रों की आराधना आत्मबोध के लिये होना चाहिये। यह सांसारिक वैभव तो मंत्रों की साधना आराधना करने से अनायास आ जाते हैं। अंतर्मन में हमारी दृष्टि सांसारिकता की ओर न जाकर मुक्ति की ओर चली गई तो कायापलट हो जाएगी। मुनि श्री ने विद्याधरों की बात करते हुये कहा कि जिनके पास जन्म से ही अनेक विद्याएं होती है,और बहुत सी विद्याएं वह सिद्ध भी करते हैं। वह भी भूमि गौचरी मनुष्यों से पीछे है,क्योंकि “विद्याओं के बल पर जीने वालों का कल्याण नहीं होता,”आत्मविद्या” में डूबने वाले ही अपना कल्याण कर पाते है।
संकल्प पूर्वक जाप करें
मुनि श्री ने कहा कि सबसे पहले संकल्प पूर्वक जाप करने का अभ्यास करो। उसमें अपनी रुचि बढ़ाकर आराधना बना लीजिये। जिससे वह आपकी साधना बन जाये। मुनि श्री ने ध्यान करने की चार विधियाँ बताते हुए कहा कि जब जाप में ध्यान लग जाएगा तो वह आपकी श्वांस श्वांस में समा जाएगा और आपकी साधना पूर्ण हो जाएगी। संचालन अमित वास्तु ने किया।













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