पैबंद लगे कपड़े पहने दिन-रात मेहनत कर बच्चों की अभिलाषाओं को सिंचिंत करने का काम करने वाला माली एक पिता ही हो सकता है। ‘इस बार नहीं अगली बार ले लूंगा’ का वादा कर बच्चों को समझाने वाला संयमी एक पिता ही होता है। खुद के लिए नहीं औरों के लिए जीने की जीवटता जिस व्यक्तित्व में है, वह पिता है। उन्हीं के चरणों में समर्पित है पितृ दिवस पर नीता सिंह की यह कविता, आप भी पढ़िए….
‘मेरे पापा‘…
पापा के लिए क्या लिखूं उनकी ही लिखावट हूं मैं
आपके बिना कुछ भी नहीं हूं आपकी छाया हूं मैं
जीवन का आधार, मेरा भरोसा हो तुम
मेरा धैर्य, सब कुछ हो तुम
दुनिया की भीड़ में, मेरी पहचान हो तुम,
मेरे जीवन का अभिमान हो तुम।
आपने जो किया वह शब्दों में नहीं हो सकता बयां
किसान होते हुए जो आपने मेरे लिए इतना किया
आपकी आवाज़ कानों में गूंजती रहती है पापा
काश बचपन हम फिर से जी पाते पापा
हमने पापा आपको किसानी के संघर्ष में परेशान देखा है
लेकिन हमारी जरूरतों को कभी मना करते नहीं देखा है
खुद भूखे रहकर हमें खिलाते अपनी जरूरत भूलकर हमारी ख्वाहिश पूरी की
झुकी कमर पसीने से भींगी माथे पर रेखाएं यहीं तो निशानी आपके असीम प्यार की
दर्द बांटा सबका मगर स्वयं का का नहीं
कहने को बहुत कुछ था पर कुछ कहा नहीं
पर कहना है हमको भी आप से आज
है गर्वित आपसे क्योंकि आप जैसे पापा है पास
-नीता सिंह, उच्च माध्यमिक शिक्षक, नरवर, (शिवपुरी)













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