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श्रीफल जैन न्यूज का आज का ईवनिंग बुलेटिन : धार्मिक शिक्षा और संस्कारों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत


आप देख रहे हैंं श्रीफल जैन न्यूज का ईवनिंग बुलेटिन। आप सभी का स्वागत है, मैं हूं रेखा जैन तो आइए नजर डालते हैं एक खास सर्वे पर, जिसमें जो आंकड़े सामने आए हैं, वे धर्म, संस्कार-संस्कृति के लिहाज से चिंता जनक है और समाज संस्थाओं को उस दिशा में काम करने की आवश्यकता है, इसके साथ ही हैं कुछ और खास खबरें भी….


https://youtu.be/51piBqzgeOs?feature=shared

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लोकेशन इंदौर

स्टोरी – रेखा संजय जैन संपादक

सुनते हैं और बार-बार दिखाया जाता है कि मंदिरों में श्रावकों की संख्या बढ़ रही है। यह कितना सच है, इस पर गहराई से अध्ययन करें तो दो चीजें सामने आती हैं एक संख्या तो बढ़ी है लेकिन आस्था-विश्वास कम हुआ है। यह बात एक सर्वे में सामने आई है। यह सर्वे अलग-अलग शहर में अलग-अलग उम्र, अलग-अलग क्षेत्र में काम करने वालों 300 व्यक्तियों पर हुआ। उनसे पूछे गए सवालों के आधार पर यह परिणाम समाने आया कि धर्म सभा, धर्म क्षेत्र में संख्या बढ़ी पर आस्था विश्वास, त्याग में कमी आई है। यह सर्वे श्रीफल पत्रिका ने 2021 में करवाया था। सर्वे में पूछा कहा था कि मंदिर क्यों जाते हो तो जो उत्तर सामने आया वह प्रतिशत में आपको बता रहे हैं…

* माता पिता में कहने पर 30 %

* ग्रह नक्षत्र की शांति के लिए 18 %

* साधु संतों के आकर्षण के कारण 9 %

* परिवार की परम्परा का निर्वाह करने किए 11%

* साधु संतों के नियम देने के कारण 5%

* प्रभु का स्मरण करने से कोई काम होगा तब 15 %

* मनुष्य भव का कर्तव्य है यही से सुख शांति मिलती है 10%

* अन्य कार्य भी बताया 2%

सर्वे में जो आंकड़े आए हैं वह इसलिए भी सत्य है कि आज दिखाई दे रहा है। अभिषेक, पूजन, दर्शन करने वाले कितने मिलते हैं मंदिरों में और समय-समय पर कार्यक्रम होते हैं तो संख्या एकदम से बढ़ जाती है या अपनी पसंद के साधु-संत आते हैं तो संख्या बढ़ जाती है।

जो मंदिर जाते हैं उनसे त्याग, नियम को लेकर पूछा और जो उत्तर सामने आए, उसे प्रतिशत में आप को बता रहे हैं…

* रात्रि भोजन त्याग 15 %

* अष्टमूलगुण का पालन 10 %

* व्रत नियम 5%

* महाराज साहब में ,रात्रि भोजन आदि का त्याग करवा दिया, कुछ समय का समय पूरा होते ही शुरू कर दूंगा 20%

* कुछ नियम नहीं, मात्र मंदिर जाते हैं 45%

* स्वाध्याय करने वालों की संख्या 5%

जैन धर्म के इतिहास के बारे में पूछा तो मात्र 8 % लोगों सही जवाब दिया, बाकी 98 प्रतिशत लोग जैन धर्म का इतिहास ही नहीं जानते हैं

इन आंकड़ों को जानने के बाद जब वर्तमान में एक नजर डाली कि कितनी संस्थाएं धर्म के अध्ययन पर उत्साह से फोकस करती हैं और आधुनिक साधनों से पढ़ाती हैं। तो मात्र एक संस्थान दक्षिण भारत महासभा इस काम में आगे है, बाकी की संस्थाएं मात्र विभाग खोल कर बैठी हैं और जैसा हो रहा, वैसा कर रही हैं।

भारत में लगभग 9465 जैन मंदिर हैं, उनमें मात्र 1200 के लगभग में पाठशाला शुरू हुई, बाकी मंदिरों साप्ताहिक, मासिक, अन्य समय-समय पर शिविर आदि आयोजित करते हैं।

इस सब आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि हम सब को भीड़ दिखाई देती है उसमें आस्था, श्रद्धा वाले कम हैं और कोई न कोई अन्य कार्य वाले अधिक हैं।

इन आंकड़ों को कम करने के लिए और आस्था, श्रद्धा को बढ़ाने के लिए कुछ ऐसा करने की आवश्यकता है।

* जैन धर्म के अध्ययन और अनुसंधान के लिए एक समर्पित संस्थान की स्थापना।

* प्रत्येक परिवार में धार्मिक शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए पाठशाला का आयोजन।

* डिजिटल माध्यम से जैन संस्कृति और शिक्षाओं का प्रसार।

* जैन धर्म के मूल तत्वों का गहराई से अध्ययन।

* विभिन्न धार्मिक आयोजनों और कार्यक्रमों का सुनियोजित प्रारूप तैयार करना।

यह करने से लाभ

-जैन संस्कृति के प्रति जागरूकता बढ़ाना।

-धार्मिक शिक्षा और संस्कारों को नई पीढ़ी तक पहुंचाना।

-समुदाय के सदस्यों को एकजुट करना और सहयोग को प्रोत्साहित करना

आज इंटरनेट पर भी आधी- अधूरी जानकारी मिल रही है, वैसे भी युवा पीढ़ी धर्म के इतिहास को सही नहीं जान पा रही है।

जानकारी के साथ श्राद्ध और आस्था बने, इसके लिए पुराने समय जो आश्रम विद्या की पद्धति थी, उसे समझना होगा। उसके लिए अब सोशल मीडिया के माध्यम से पाठशाला, घर-घर पाठशाला, धर्म के कॉल सेंटर तैयार करने होंगे। विज्ञान धर्म का ही हिस्सा है, यह बताना होगा।

Slug – मंदिर जाने वाले बढ़े लेकिन आस्था और श्रद्धा हुई कम

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लोकेशन दिल्ली

रिपोर्टर – मनीष जैन

भारत में कितने नागरिक हैं, इसकी जनगणना होनी है। उनका नाम, जन्म, तारीख, शहर…ऐसी कई जानकारी के साथ एक कॉलम आएगा जाति का, वहां आप सब को जैन लिखना चाहिए। पाटनी, शाह, गांधी, सेठी, वेद आदि नहीं लिखना है। ये सब गोत्र हैं। यह इसलिए जरूरी है कि सरकारी आंकड़ों में अगर हमारी संख्या कम आती है तो उसका प्रभाव हमारे तीर्थ क्षेत्र, इतिहास आदि के साथ हमारे लिए मिलने वाली सरकारी सुविधाओं पर भी पड़ता है। इसके साथ ही राजनीति क्षेत्र में भी प्रभाव कम रहता है क्योंकि हमारी संख्या कम दिखाई देती है तो राजनेता भी हमें इग्नोर करते हैं। कई बार सुनने को मिलता है कि तुम हो गी कितने। इसलिए हर जैन को यह अभियान बनाना है कि वह अपने आस पास वालों को, परिवार, मित्र को यह सन्देश भेजे कि जनगणना के समय में जाति वाले कालम में मात्र जैन ही लिखना है। आज ही जागे तो उसका परिणाम हमें मिलेगा। नहीं तो आने वाले समय में सरकारी आंकड़ों में जैनों की संख्या कम होने के साथ हमारे इतिहास और संस्कृति का समावेश हिन्दू समाज में हो जाएगा।

Slug- जनगणना में लिखें केवल जैन, गोत्र नहीं

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लोकेशनः- इंदौर

रिपोर्टः- राजेश जैन दद्दू

मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में 24 मई 1986 को पिता राजेश और मां वीणा के घर जन्मे सन्मति ने साल 8 नवंबर 2011 को मंगलगिरी तीर्थ सागर में आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज से दीक्षित होकर अपनी साधना आरंभ की। यह दिन जैन समाज के लिए बहुत पुनीत दिन है। सन्मति जैन ने बीबीए और एमबीए में गोल्ड मेडल प्राप्त किया। 8 नवम्बर 2011 आचार्य श्री विशुद्ध सागर से दीक्षित होने के बाद आचार्य श्री ने सन्मति भैया का नामकरण मुनि श्री आदित्य सागर किया। सन्मति भैया ने विशुद्ध सागर में डुबकी लगाई और जब बाहर निकले तो वह सन्मति भैया नहीं बल्कि मुनि आदित्य सागर बनकर निकले। उन्होंने गुरु के सानिध्य में रहते हुए जैन समाज को सत्य पथ दिखाया। साथ ही निरंतर श्रमण संस्कृति को नित नए आयामों से गौरवान्वित किया। मुनि श्री को प्राचीन कन्नड़ पढ़ना भी आता है। इसके लिए 2018 के महामस्तकाभिषेक के बाद बैंगलोर में रहकर उन्होंने इसका अध्ययन किया था।

Slug – जैन समाज को दिखाया सत्य का पथ

आज के लिए इतना ही। कल पुनः इसी समय आप से मुलाकात होगी। आप के पास भी जैन धर्म से संबंधित कोई भी खबर संबंधित हो तो हमें 9460155006 अवश्य भेजें

जय जिनेन्द्र

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