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भगवान श्री पार्श्वनाथ जी का 2872वां ज्ञान कल्याणक दिवस 18 मार्च को : हरिवंश पुराण में है वर्द्धमानपुर के पार्श्व चैत्य का उल्लेख


जैन धर्म के तेईसवें तीर्थंकर भगवान श्री पार्श्वनाथ जी का जन्म 877 वर्ष ईसा पूर्व बनारस में हुआ था।उन्होंने 30 वर्ष की आयु में दीक्षा ग्रहण की। चैत्र मास की चतुर्थी को केवल ज्ञान (सर्वज्ञता) की प्राप्ति की थी।भगवान का ज्ञान कल्याणक महोत्सव 2872वां होगा। पढ़िए इंदौर से ओम पाटोदी की यह प्रस्तुति…


इंदौर। जैन धर्म के तेईसवें तीर्थंकर भगवान श्री पार्श्वनाथ जी का जन्म 877 वर्ष ईसा पूर्व बनारस में हुआ था। उन्होंने 30 वर्ष की आयु में दीक्षा ग्रहण की और चैत्र मास की चतुर्थी को केवल ज्ञान (सर्वज्ञता) की प्राप्ति कर ली थी। इस आधार पर हम देखते हैं तो 18 मार्च मंगलवार चैत्र कृष्ण चतुर्थी को मनाया जाएगा। यह भगवान का ज्ञान कल्याणक महोत्सव 2872वां होगा। वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने बताया कि इंदौर महानगर से 95 किमी, रतलाम से 40 किमी एवं धार जिला मुख्यालय से 45 किमी की दूरी पर स्थित ऐतिहासिक नगर बदनावर, जिसका प्राचीन नाम वर्द्धमानपुर रहा है। यहां भूगर्भ से लगभग 80 वर्ष पूर्व भगवान पारसनाथ की सात प्राचीन प्रतिमाएं प्राप्त हुई थी। बदनावर वर्द्धमानपुर ऐतिहासिक नगरी है। इस बात के प्रमाण यहां से प्राप्त विपुल पुरातात्विक जैन अवशेष से तो मिलता ही है लेकिन, आठवीं शताब्दी में प्रबुध्दाचार्य श्री जिनसेन स्वामी के प्रसिद्ध हरिवंश पुराण जो इसी नगरी में बैठकर लिखा गया था। उसमें भी शांति चैत्य और पार्श्व चैत्य का उल्लेख मिलता है। बदनावर (वर्द्धमानपुर) की प्राचीनता का शास्त्रीय प्रमाण है और यह इस बात का द्योतक भी है कि इस नगरी का भगवान महावीर और पार्श्वनाथ से भी विशेष संबंध रहा है।

भगवान का केवल ज्ञान क्षेत्र अहिच्छत्र 

भगवान का केवल ज्ञान कल्याणक स्थान अहिक्षेत्र रामनगर आंवला तहसील बरेली के पास उत्तर प्रदेश में माना गया है। प्रभु पार्श्वनाथ जब तपस्या में लीन थे। तब पूर्व भव के बेर के कारण कमठ के जीव (जो इस समय ज्योतिष्क जाति का देव बना, उसका नाम अब संवर था) ने यहां आकर घोर उपसर्ग किया लेकिन, मुनि पार्श्वनाथ अपने ध्यान में इतने मग्न थे कि उन्हें संवर देव द्वारा किए जा रहे उपसर्ग का एहसास ही नहीं हुआ और उनकी घोर तपस्या के कारण उन्हें उस समय केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई। उनके सारे उपसर्ग स्वतः ही समाप्त हो गए। देवों और इंद्रों के आसन कंपित हुए। इंद्रों ने स्वर्गलोक से आकर भगवान के केवल ज्ञान की पूजा की। यह स्थान अहिच्छत्र था। नागेंद्र द्वारा भगवान के ऊपर छत्र लगाया गया था। इस कारण इस स्थान का नाम संख्यावती (प्राचीन नाम) के स्थान पर अहिच्छत्र हो गया। साथ ही भगवान के केवल ज्ञान कल्याणक की भूमि होने के कारण यह पवित्र तीर्थक्षेत्र हो गया।

भगवान आदिनाथ से है अहिच्छत्र का इतिहास 

अहिच्छत्र नगरी भारत की प्राचीनतम नगरियों में से एक है। भगवान ऋषभदेव ने जिन 52 जनपदों की रचना की थी। उसमें एक पांचाल भी था। परवर्तीकाल में पांचाल जनपद दो भागों में विभक्त हो गया। उत्तर पांचाल और दक्षिण पांचाल। पहले संपूर्ण पांचाल की ही राजधानी अहिच्छत्र थी, किन्तु विभाजन होने पर उत्तर पांचाल की राजधानी अहिच्छत्र रही और दक्षिण पांचाल की कंपिला। जैन साहित्य में पांचाल के प्रायः इन दो भागों का उल्लेख मिलता है। महाभारत काल में अहिच्छत्र के शासक द्रोण थे और कंपिला के द्रुपद। भगवान पार्श्वनाथ ऐतिहासिक महापुरुष थे। उनका प्रभाव तत्कालीन संपूर्ण भारत-विशेषतः उत्तर और पूर्व भारत में अत्यधिक था।

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