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गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के सानिध्य में हुआ आयोजन : भारतीय ज्ञान परंपरा एवं जैन साहित्य पर राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न 


तीर्थंकर ऋषभदेव जैन विद्वत् महासंघ एवं भारतीय ज्ञान परंपरा-जैन गणित केन्द्र, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर के संयुक्त तत्त्वावधान में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा एवं जैन साहित्य’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी श्रुत पंचमी के पवन पर्व पर दिगम्बर जैन तीर्थ अयोध्या में आयोजित की गई। इस संगोष्ठी में 35 से अधिक विद्वान सम्मिलित हुए। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…


अयोध्या। तीर्थंकर ऋषभदेव जैन विद्वत् महासंघ एवं भारतीय ज्ञान परंपरा-जैन गणित केन्द्र, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर के संयुक्त तत्त्वावधान में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा एवं जैन साहित्य’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी श्रुत पंचमी के पवन पर्व पर दिगम्बर जैन तीर्थ अयोध्या में आयोजित की गई। इस संगोष्ठी में 35 से अधिक विद्वान सम्मिलित हुए।

संगोष्ठी की अध्यक्षता IKS Division शिक्षा मंत्रालय भारत सरकार के राष्ट्रीय समन्वयक प्रो. जी.एस.मूर्ति ने की। मुख्य अतिथि थे शोभित विश्वविद्यालय, मेरठ के पूर्व कुलपति एव चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ गणित के आचार्य प्रो. एस. सी. अग्रवाल । विशेष अतिथि के रूप में देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर के कुलपति प्रो. राकेश सिंघई एवं मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, भोपाल की आचार्य प्रो. ज्योति सिंघई उपस्थित रहीं ।

अ. भा. दि. जैन महिला संगठन – मध्य प्रदेश की अध्यक्ष आशुकवियत्री श्रीमती उषा पाटनी जी ने स्वरचित मंगलाचरण में संगोष्ठी की विषयवस्तु एवं पुरस्कार समर्पण समारोह का पूरा चित्र प्रस्तुत किया।

संगोष्ठी में डॉ. सुशील जैन ( कुरावली) ने प्रथम वक्ता के रूप में विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में जैन साहित्य का महत्त्वपूर्ण स्थान है। जैन साहित्य ने भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध किया है, आचार्य धरसेन का बहुत उपकार है कि उन्होंने षटखंडागम जैन ग्रंथ आज हमें उपलब्ध कराया।

डॉ. अल्पना जैन मोदी ( ग्वालियर), ने कहा कि भगवान ऋषभदेव द्वारा प्रदत्त उपदेश के कुछ अंशों को परिवर्ती आचार्यों ने सुरक्षित रखकर उसे चारों अनुयोगों में निबद्ध किया जिसमें कथा, काव्य, स्तोत्र, गणित, ज्योतिष, वास्तु आदि सब कुछ सम्मिलित है।

युवा मनीषी डॉ. भरत जैन (इन्दौर) ने कहा कि जैन धर्म में पर्यावरण को विशेष अर्थ में न सीमित करते हुए जीवन के समस्त कार्यकलापों में सृष्टि का कम से कम दोहन कर अधिकतम लाभ प्राप्ति का मार्ग बताया गया है। जैन जीवन शैली ही पर्यावरण हितैषी है।

डॉ. रश्मि जैन (फिरोजाबाद), ने मध्यकालीन हिन्दी जैन काव्य को भारतीय ज्ञान परंपरा की निधि निरूपित करते हुए बताया कि इन काव्यों में अध्यात्म, दर्शन ही नहीं इतिहास की भी महत्वपूर्ण जानकारी है। डॉ. रश्मि जी ने अनेक कवियों के उदाहरण प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया ।

शीतल तीर्थ – रतलाम की अधिष्ठात्री डॉ. सविता जैन ने कहा कि इस युग के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ ) ने अपनी दोनों पुत्रियों ब्राह्मी एवं सुन्दरी को लिपि

एवं अंक ज्ञान की शिक्षा प्रदान की। प्रथम गुरू एवं नारी सशक्तिकरण का उच्च मानदण्ड स्थपित किया आपने असि, मसि, कृषि आदि षविधाओं की शिक्षा दी ।

तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद के जैन अध्ययन केन्द्र के निर्देशक प्रो. विपिन जैन ने TMU में भारतीय ज्ञान परम्परा केंन्द्र की प्रो. अनुपम जैन के निर्देशन में चल रही गतिविधियों एवं जैन अध्ययन केन्द्र में चल रहे शोधकार्यों की जानकारी दी।

महासंघ के अध्यक्ष डॉ. अनुपम जैन (इन्दौर), ने विस्तार से भारतीय ज्ञान परम्परा के भेदोपभेदों की जाकारी दी एवं बताया कि यह परम्परा लिखित एवं अलिखित दोनों है। लिखित में वैदिक एवं श्रमण दोनों परम्पराओं का साहित्य महत्त्वपूर्ण है। वस्तुतः जैन साहित्य का सम्यक् अनुशीलन किये बगैर भारतीय ज्ञान परम्परा को समझना संभव ही नहीं है। इस ज्ञान परम्परा में गणित का महत्त्वपूर्ण स्थान है जिस पर लिखा संदर्भ ग्रंथ जैन गणित आज विवेचित होगा ।

मौलाना आजाद प्रौद्योगिकी संस्थान, भोपाल से पधारी प्रो. ज्योति सिंघई ने कहा कि संस्कारों का बीजारोपण परिवार से ही प्रारम्भ हो जाता है। हम अपने बड़े बुजुगों के माध्यम से अनेक संस्कारों को सहज ही स्वीकार कर उच्च स्तरीय जीवन शैली को अंगीकार कर सुखद समाज बनाते है जो समाज निर्माण में सहायक होते है। हमारे केन्द्र पर गायत्री मंत्र का मानव शरीर पर प्रभाव का अध्ययन किया जा रहा है मैं चाहती हूँ कि णमोकार मंत्र पर भी अध्ययन हो जिससे मष्तिष्क तरंगों पर उसके प्रभाव का आकलन हो सके।

मुख्य अतिथि प्रो. अग्रवाल (मेरठ) ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा का अन्य सभ्यताओं में विकसित ज्ञान के साथ तुलनत्मक अध्ययन किया जाना चाहिए। बेबोलियन, मेसोपोटामियान, ग्रीक आदि सभ्यताओं में जो ज्ञान परम्परा रही है उससे तुलना करने पर हम भारतीय ज्ञान परम्परा को ग्लोबल स्तर पर प्रतिष्ठित कर सकेंगे।

अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. मूर्ति ने विद्वानों का आह्वान किया किया कि वे ज्ञान कि विभिन्न क्षेत्रों में जैनाचार्यों एवं जैन साहित्य के योगदान का अध्ययन करें। IKS Division से हम उन्हें पूरा सहयोग देंगे।

कार्यक्रम का सशक्त एवं प्रभावी संचालन डॉ. संजीव सराफ (वाराणसी) ने किया। आभार माना महासंघ के महामंत्री प विजय कुमार जैन ने ।

सभी सहभागियों को सम्पुट (Kit) प्रदान किये गये।

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