अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज के 9वें दीक्षा दिवस पर श्रीफल जैन न्यूज में उन्हीं की कलम से उनकी जीवनगाथा प्रस्तुत की जा रही है। पाठकों को इस लेखनमाला की एक कड़ी हर रोज पढ़ने को मिलेगी, आज पढ़िए इसकी दसवीं कड़ी….
10. अभिषेक-पूजन की शुरुआत
बिजौलिया में था आचार्य श्री का संघ। अब मैं आचार्य श्री को रोज आहार देने लगा, वह क्या लेते हैं, क्या नहीं? पहले क्या लेते हैं, बाद में क्या लेते हैं, उनकी आहारचर्या का क्रम क्या होता है, मैं अब देखकर धीरे-धीरे सीखने लगा था। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी को आहार देने के लिए दीदियों का क्रम तो रोज बदलता था।
कभी कोई दीदी तो कभी कोई दीदी आती लेकिन मैं रोज जाता था क्योंकि उस समय कोई और भैया संघ में नहीं था। मुझे ऐसा लगा कि आहार देने से बहुत पुण्य मिलता है क्योंकि अब जो कुछ भी आचार्य श्री और माता जी पढ़ाती थीं, वह सब याद होने लगा। मुझे ऐसा लगा कि मेरी स्मरण शक्ति बढ़ गई है। अब मेरी रुचि पढ़ाई में बढ़ने लगी थी। मैं प्रश्न करने भी लगा था, तो माता जी कहतीं कि देखना धर्म के प्रभाव से तुम्हें सब आने लगा है। भगवान की और आचार्य श्री की भक्ति ऐसे ही करते रहना। अब मैं आचार्य संघ के मूलनायक भगवान चंद्रप्रभु का दीदियों के साथ पंचामृत अभिषेक और पूजन करने लगा।
दीदियां मुझे सिखाती थीं कि पूजन-अभिषेक कैसे करना है। धीरे- धीरे मैंने भी देख-देखकर कर सीख लिया कि अभिषेक ,पूजन की क्रिया क्या है। मेरे पास न तो पूजन सामग्री थी और न ही अभिषेक करने की। कभी किससे तो कभी किससे मांग लेता या किसी भी दीदी की थाली में से सामग्री ले लेता था। उसमें भी कभी-कभी मुझे संक्लेश हो जाता था। जिसकी भी सामग्री होती थी, वह कहता था कि तुमने इतनी सामग्री क्यों काम में ली, अभी तो मेरा पूजन-अभिषेक बाकी है। तुम्हें शाम को ही कहना चाहिए था कि इतनी पूजा करोगे, अब वापस धोना होगा। सब कुछ ना कुछ कहते ही थे तो संक्लेश हो ही जाता था।
एक दिन मैंने आचार्य श्री और माता जी से कहा कि पूजा में इस प्रकार से संक्लेश होगा तो मैं पूजा नहीं करूंगा। अगले दिन मुझे पूजा के बर्तन और सामग्री अलग से लाकर दे दी गई। आचार्य श्री ने कहा कि तुम इसमें से पूजन करो। तुम अपनी सामग्री स्वयं धोना और पूजन-अभिषेक करना। उस दिन से मैं अलग से पूजन करने लगा। शुरू शुरू में तो नहीं आता था कि सामग्री को कैसे धोना है लेकिन धीरे-धीरे वह भी आ गया।













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