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धर्मसभा में दिए प्रवचन : परिवार मेरे साथ नहीं रहता है, मैं परिवार के साथ रहता हूं – मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज


धन तो सब चाह रहे हैं लेकिन तरीके इतने भिन्न हैं कि एक धन कमाकर सेठ बन जाता है और एक धन कमाकर डाकू बन जाता है। दोनों की दृष्टि धन पर है लेकिन वह धन से प्रभावित होते ही किसी की तिजोरी में पैसा देखा और मन ललच जाता है। जब जब तुम किसी के पास कोई संपत्ति देखकर उसे हांसिल करने का भाव करोगे तो तुम्हें डाकू बनना पड़ेगा। धन देखकर धन से प्रभावित होना बुरी चीज नहीं थी, धन को देखकर वो धन मुझे कब मुझे मिली यह बुरी आदत थी। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में प्रवचन के दौरान कही। पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट…


सागर। धन तो सब चाह रहे हैं लेकिन तरीके इतने भिन्न हैं कि एक धन कमाकर सेठ बन जाता है और एक धन कमाकर डाकू बन जाता है। दोनों की दृष्टि धन पर है लेकिन वह धन से प्रभावित होते ही किसी की तिजोरी में पैसा देखा और मन ललच जाता है। जब जब तुम किसी के पास कोई संपत्ति देखकर उसे हांसिल करने का भाव करोगे तो तुम्हें डाकू बनना पड़ेगा। धन देखकर धन से प्रभावित होना बुरी चीज नहीं थी, धन को देखकर वो धन मुझे कब मुझे मिली यह बुरी आदत थी। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में प्रवचन के दौरान कही। उन्होंने कहा कि मन ललाचने का अर्थ है यह वस्तु मुझे मिल जाए, समझ लेना तुम्हें उसको पाना है तो डाकू बनना पड़ेगा, दूसरा एक तरीका है उस धन को पाने के लिए शकुनि मामा बनना पड़ेगा, जुआ खेलना पड़ेगा। डाकू सामने वाले का नाश करके धन प्राप्त करता है और जुआ धन वाले का नाश नही करता, पांसे फेंककर धन ले लेता है। दूसरे और तरीके में सामने वाले का वीक पॉइंट देखकर के उसको धन को अपने हवाले करा लेना।

धन का लोभी सीधा डाकू बनता है

मनि श्री ने कहा कि ऐसा ही तुमने किसी धर्मात्मा को देखा, सिद्ध, अरिहंत, मुनियों को देखा, तुम्हारी मन में उस धनी के समान भाव आया कि मैं भी एक दिन भगवान बनूंगा। वहाँ धन पाने का लालच आया, ऐसे ही यहां धर्म की महिमा सुनी तो मन लालच गया कि यदि धर्म मेरे पास आ जायेगा तो मैं संसार की हर वस्तु प्राप्त कर लूँगा। मैं मंदिर जाऊंगा दान करूंगा, पूजा करूंगा, व्रत करूंगा तो मुझे बहुत इज्जत मिलेगी, शान शौकत मिलेगी और संसार की सर्वश्रेष्ठ वस्तु मिलेगी। ऐसा ललाचानने के बाद वहां तो डाकू बना था और यहां डाकू साधु बन गया। धन का लोभी सीधा डाकू बनता है और कभी-कभी धन चुराने के लिए डाकू भी साधु बन जाता है। जब जब भक्त के मन में आया कि मेरा मंदिर है, यह मेरे भगवान है, समझ लेना भाई भक्त नहीं रहा गुंडा बन गया। वह निडर होकर जाएगा, जो चाहे वह करेगा क्योंकि वह उस मंदिर का अध्यक्ष है, ये अंग्रेजों की दिन है, पहले कोई मंदिर का अध्यक्ष, कमेटी नहीं होती था, भक्त के भगवान नहीं होते थे, भगवानों का भक्त होता था।

अपनी भाषा बदलो

जब तुम्हारे मन में यही भाव आ जाए कि मेरी मम्मी पापा, घर के बड़े लोग मेरे से पूछे बिना कुछ नहीं करते, मेरे बिना घर का पत्ता नही हिल सकता, कोई कुछ नहीं करता, समझ लेना तुम उस घर के सदस्य नहीं, उस घर का गुंडा हो। एक बाजार का गुंडा है जो दूसरों पर गुंडागर्दी करता है, तुम तो महा गुंडे हो जो अपने बाप पर, परिवार पर गुंडागर्दी करते हो। यदि गुंडे बनने की इच्छा हो तो बाजार का गुंडा बन जाना लेकिन कभी परिवार में गुंडा मत बनना। कभी तुम्हें यह भाव आ गया हो कि मेरे से पूछे बिना घर का व्यक्ति दान भी नहीं दे सकता, ऐसा स्वप्न में भी भाव आ गया हो कभी तो कृपया कर प्रायश्चित कर लेना, यह बहुत बड़ा पाप तुम्हारे मन में आया है। घर में ऐसा माहौल बनाओ कि धार्मिक कार्य करने के लिए मेरे से पूछने की जरूरत नहीं है, हर व्यक्ति स्वतंत्र है। मेरे माता-पिता मेरे साथ रहते हैं यह पाप वाक्य छोड़ो, यह अनाथ बनने का लक्षण है अगले भाव में तुझे ऐसे गन्दे माता पिता मिलेंगे जो तेरी एक भी सुनने वाले नहीं होंगे, एकदम अनाथ बनोगे। यदि तुमने कभी सपने में कहा कि मम्मी पापा मेरे साथ रहते हैं, घर में मेरी बात के बिना कोई कुछ नहीं कर सकता और इस बात की तुम्हें खुशी और हो जाये, अब तुमने अनाथ बनने का स्वयं को निमंत्रण दे दिया, ऐसे गंदे माता-पिता मिलेंगे कि तुम दो दो दो आंसू रोओगे कि मुझे ऐसा बाप मिला, इसलिए भाषा बदलो परिवार मेरे साथ नहीं रहता है मैं परिवार के साथ रहता हूँ।

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