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भव्य पिच्छिका परिवर्तन महोत्सव के साथ मुनिश्री का चातुर्मास पूर्ण: शोभायात्रा में गूंजे गुरुवर के जयकारे, भक्तों ने किया पाद प्रक्षालन 


स्थानीय दिगंबर जैन बड़ा मंदिर में विराजमान आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज के शिष्य मुनिश्री गुरुदत्तसागर जी और मुनिश्री मेघदत्त सागर जी का चातुर्मास भव्य पिच्छिका परिवर्तन समारोह के साथ पूर्ण हुआ। कार्यक्रम में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। महरौनी से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर…


महरौनी। स्थानीय दिगंबर जैन बड़ा मंदिर में विराजमान आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज के शिष्य मुनिश्री गुरुदत्तसागर जी और मुनिश्री मेघदत्त सागर जी का चातुर्मास भव्य पिच्छिका परिवर्तन समारोह के साथ पूर्ण हुआ। कार्यक्रम में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। प्रातःकालीन बेला में भगवान जिनेंद्र का अभिषेक, शांतिधारा एवं पूजन किया गया। इसके पश्चात नगर में शोभायात्रा निकाली गई जो धर्ममय उल्लास से परिपूर्ण रही। सुसज्जित पिच्छिकाएं जब बैंड-बाजों के साथ नगर भ्रमण पर निकलीं तो मार्ग श्रद्धा और जयकारों से गूंज उठा। शोभायात्रा का समापन बड़े मंदिर प्रांगण में हुआ। इसके बाद विद्यासागर सभागार में मुख्य समारोह आरंभ हुआ। ब्रह्मचारी भाई-बहनों ने आचार्य श्री विद्यासागर जी, आचार्यश्री समयसागर जी और आचार्यश्री निर्भय सागर जी महाराज के चित्र का अनावरण एवं दीप प्रज्ज्वलन कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। दिगंबर जैन पंचायत कमेटी द्वारा बाहर से आए अतिथियों एवं मुनिश्री के गृहस्थ अवस्था के परिजनों का माल्यार्पण कर सम्मान किया गया।

महिला मंडल, बालिका मंडल एवं जैन पाठशाला के बच्चों द्वारा प्रस्तुत किए गए। सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने सभी का मन मोह लिया। समारोह में मुनिश्री का पाद प्रक्षालन, पूजन एवं शास्त्र भेंटकर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया गया। पिच्छिका प्रदान का सौभाग्य इस प्रकार प्राप्त हुआ आचार्य श्री निर्भय सागर जी के लिए श्रीनिवास कठरया को, मुनिश्री गुरूदत्त सागर जी के लिए राकेश सतभैया को, मुनिश्री मेघदत्त सागर जी के लिए डॉ. विनोद जैन (विदिशा) को यह पुण्य अवसर प्राप्त हुआ। वहीं पुरानी पिच्छिका लेने का सौभाग्य प्रमोद सिंघई एवं रश्मि मलैया को मिला। धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री गुरुदत्तसागर जी ने कहा कि पिच्छिका केवल एक उपकरण नहीं, यह संयम और करुणा की जीवंत प्रतिमूर्ति है। यह साधु को जीव हिंसा से बचाती है और आत्मा की शुद्धि की दिशा में अग्रसर करती है। कमंडल पवित्रता का प्रतीक है जबकि, शास्त्र हमें मोक्ष मार्ग की ओर प्रेरित करते हैं।

जब तक मनुष्य धर्म और संयम से जुड़ा रहेगा, जीवन की दिशा मोक्ष की ओर बढ़ती रहेगी। मुनिश्री ने आगे कहा कि “जीवन में धर्म का समावेश ही सच्ची समृद्धि है। सेवा, संयम और साधना से ही आत्मा का कल्याण संभव है। अंत में मुनिश्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। इस अवसर पर सकल दिगंबर जैन समाज सहित आसपास के नगरों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। संचालन नितिन शास्त्री एवं प्रियंक बाजा ने किया।

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