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मुनिश्री सर्वार्थ सागर जी का पंढरपुर में 34 वां अवतरण दिवस मनाएंगे: आढीव पंढरपुर में पंचकल्याणक महोत्सव हुआ शुरू


आचार्य श्री विशुद्धसागर महाराज जी ससंघ के सानिध्य में 1 फरवरी से आढीव पंढरपुर में पंचकल्याणक महोत्सव प्रारंभ होने रहा है। यहां मुनि श्री सर्वार्थ सागर जी का अवतरण दिवस भी मनाया जाएगा। यहाँ पढ़िए उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं पर मनाली पाटणी की यह विशेष जानकारी… । पढ़िए अभिषेक पाटली की विशेष रिपोर्ट


पंढरपूर (महाराष्ट्र )। चर्या शिरोमणी आचार्य श्री विशुद्धसागर महाराज जी ससंघ के सानिध्य में 1 फरवरी से आढीव पंढरपुर में पंचकल्याणक महोत्सव प्रारंभ होने रहा है। रांची की मुनि श्री सर्वार्थसागर महाराज जी की परम भक्त मनाली पाटणी ने बताया कि आचार्य विशुद्ध सागर महाराज जी द्वारा दीक्षित विचित्र बाते प्रणेता मुनि श्री सर्वार्थ सागर जी की प्रेरणा से विचित्र बातों से आज जैन धर्म की अभूतपूर्व प्रभावना सोशल मीडिया के माध्यम से हो रही हैं। 34 वें अवतरण दिवस के उपलक्ष्य में मुनि श्री सर्वार्थ सागर महाराज जी के गुणों के साथ उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालते हैं।

गुरु के अवतरण दिवस पर नमन

आया है आराध्य देव के जन्म दिवस का उत्सव।

बनाया है जिन्होंने इस नर जीवन को अमृतोत्सव।

लुटाते हैं जो वात्सल्य हम सब पर बेशुमार।
देखकर जिनकी मुद्रा हो जाता भव्यों का बेड़ा पार।

मुस्कान से जिनकी मुखरित होता है सौम्य दर्श।
देख जिनकी छवि छा जाता हर्ष ही हर्ष।

ऐसे उपकारी गुरु के अवतरण दिवस पर नमन अनंत बार।
पूर्णायु हो जीवन और निरत वृद्धि कर संयम में पाओ शीघ्र मोक्ष द्वार।

जिनके रोम-रोम में णमोकार मंत्र की महक
युवाओं के प्रेरणा पुंज, धरती के ऐसे देवता जो तन से विशुद्ध, मन से विशुद्ध, चर्या से विशुद्ध ऐसे वितराग आचार्य श्री विशुद्ध सागरजी महाराज हैं। आचार्य विशुद्धसागरजी महाराज ये एक ऐसे संत हैं। जिनकी आध्यात्म की गहराई से सत्यार्थ का बोध होता है। ये एक ऐसे संत हैं। जिनके चरणों में शीतलता मिलती है l जिनकी एक मुस्कुराहट से सारी थकान मिट जाती हैl ये ऐसे संत है जिनके रोम-रोम में णमोकार मंत्र की महक है।

मप्र के सलेहा गांव में जन्मे संत शिरोमणि
विचित्र बाते प्रणेता श्रमण मुनि श्री सर्वार्थ सागर महाराज जी के अवतरण दिवस पर आइए जानते हैं उनके जीवन की कुछ खास बातें……

34 वर्ष पूर्व वसंत की बहार में एक भावी संत का जन्म हुआ था,जिसको पाकर परिजन ही नहीं नगर का जन जन मुस्कुराया था और वह वसुधा थी पन्ना नगर के समीप बसे ग्राम सलेहा (मप्र ) की। सौभाग्यशाली दंपत्ति प्रमोद जैन एवं सुशीला जैन के आंगन में फिर एक बार खुशियां छाई थीं।1 फरबरी 1991 को जब तीसरी संतान के रूप में पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी, और उस सुंदर बालक का माता-पिता ने नाम रखा अर्पित। भला उस समय कौन जानता था कि एक दिन अर्पित जिनशासन को समर्पित हो जाएगा। बड़े भाई और बड़ी बहन का लाडला प्यारा छोटा भाई अर्पित बाल्यकाल से ही अत्यंत कुशाग्र बुद्धि का धनी था। घर के सभी काम अग्रणी होकर जो करते थे। चारों भाई बहन के खेलकूद हलचल से घर का वातावरण खुशियों से भरा रहता था।

बीएससी की पढ़ाई की
यूं तो बालक अर्पित मंदिर जाता था लेकिन, ज्यादा विशेष रुचि नहीं रहती थी। यूं ही समय बीतता गया और अर्पित के पिताश्री ने पढ़ाई के साथ धार्मिक संस्कारों से जुड़े रहें इसलिए ग्रेजुएशन करने खुरई गुरुकुल में भेज दिया। जहां से बीएससी की लौकिक शिक्षा ग्रहण की और बड़े ही अच्छे से मित्र मंडली के मस्ती मजाक करते कॉलेज की पढ़ाई की।

जहां विराजित हैं श्री आदिनाथ भगवान
पुनः घर आकर जो अपने पिता का व्यवसाय में सहयोग बड़े ही जिम्मेदारी से करने लगे लेकिन, काल तो कुछ और सोच रहा था। पुण्योदय से सलेहा (मप्र )नगर जो प्रख्यात तीर्थ श्रेयांश गिरी सीरा पहाड़ की तलहटी भी कहलाता है। जहां विराजित हैं चतुर्थकालीन श्री आदिनाथ भगवान, जिनकी ऊर्जामयी आभा जन-जन के लिए मंगलकारी है। ऐसे तीर्थ राज पर गुरुओं का आगमन होता ही रहता था। और एक बार वहां पधारे आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज। जिनकी वात्सल्य मय छवि और उनकी वाणी सुनकर धर्म की ओर मन मुड़ गया।

मुनि श्री की पुरानी पिच्छिका प्राप्त
युवा बालक अर्पित धर्म पथ का अनुकरण करने लगे। पहले जो कोई ज्यादा मंदिर आदि में रुचि नहीं रखता था, अब वह बदल गया। शुभ योग से मुनि विनिस्चल सागर जी महाराज का चातुर्मास कराने का सौभाग्य सलेहा नगर को मिला और महाराज के नगर में होने से अर्पित की लगन और मजबूत होती चली गई और फलस्वरूप मुनि श्री की पुरानी पिच्छिका भी प्राप्त हो गई। फिर कुछ दिन का विहार कराने जो मुनिराज के साथ चल दिए और मुनि संघ पहुंचता है टीकमगढ़।

हो रहा था प्रतिक्रमण का आयोजन
जहां एक माह की ग्रंथ राज रत्नकरण्डक श्रावकाचार की वाचना हुई और अर्पित भाई ने गाथाओं को कंठस्थ किया। तभी वीरभूमि राजस्थान में विशाल युग प्रतिक्रमण का आयोजन हो रहा था। जहां आचार्य विराग सागर जी महाराज सहित 250 पिच्छी विराजमान थी। अर्पित भाई भी अपने परिवार के साथ दर्शन करने पहुंचे और भावना रखी मुझे आचार्य विशुद्ध सागर जी महाराज के संघ में प्रवेश लेना है।

भीलवाड़ा में प्राप्त किया मुनि पद
पिता श्री बात को मान गए और आंसू बहाते आचार्य विशुद्ध सागर जी महाराज से कह दिया आज से यह बालक आपका है। अब आप संभालो और फिर शुरू हो गई एक अद्भुत यात्रा जो एक दिन मोक्ष महल पर पहुंचाएगी। गुरु के प्रति अनन्य भक्ति से ओतप्रोत भाई अर्पित शुरू से ही सेवा भावी रहे और अध्ययन भी अत्यंत गहराई से करते थे। आचार्य संघ विहार करते मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल पहुंचा, जहां लालघाटी जैन नगर में नेमीनाथ भगवान के समक्ष 12 जुलाई 2014 को बालक अर्पित ने ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण किया और बालब्रह्मचारी अर्पित से जाने जाने लगे। शांत सरल बालक की धार्मिक लगन और दिगंबरत्व की भावना से बहुत जल्दी फलीभूत हुई और सन 2015 के भीलवाड़ा (राजस्थान) चातुर्मास में 29 अगस्त को रक्षाबंधन के दिन गुरुकृपा बरसी और वस्त्रों की नगरी में ही वस्त्रों का त्याग करके मुनि पद को प्राप्त किया।

गुरु ने नाम रखा श्रमण मुनि सर्वार्थ सागर
गुरु ने आपका नाम रखा श्रमण मुनि सर्वार्थ सागर महामुनिराज। तब से आप अपने महाव्रतों की साधना में तल्लीन रहे। साथ ही गुरुदेव के ही सानिध्य में महान महान ग्रंथों का अध्ययन भी करते रहे। सरल शांत सौम्य मूर्ति पूज्य मुनिश्री सर्वार्थ सागर जी सदैव जिनधर्म की प्रभावना में तत्पर रहते हैं। साथ ही वैयवृत्ति में भी अग्रणी रहते हैं।

प्रवचन शैली भी ओजस्वी है

आपकी विचित्र बातें अत्यंत लोकप्रिय है। जो सबको मंत्रमुग्ध कर देती हैं। साथ ही आपकी प्रवचन शैली भी ओजस्वी है। जो छोटे-छोटे सूत्रों के माध्यम से सबको उत्थान का मार्ग देती है। आपकी प्रेरणा से विचित्र बातें आज जैन धर्म की अभूतपूर्व प्रभावना सोशल मीडिया के माध्यम से कर रहा है। जिससे जैन ही नहीं जैनेतर भी अत्यंत प्रभावित है।

सभी को भी सम्यक मार्ग प्रशस्त करें
अपने गुरु से आप दीक्षा से लेकर अभी तक लगभग 50 हजार किमी विहार कर चुके हैं। ऐसे मोक्ष पथ अनुगामी जिन धर्म का सारांश अबाल वृद्ध को बताने वाले विलक्षण चिंतक मुनि श्री सर्वार्थ सागर महाराज जी के पावन चरणों में कोटि कोटि नमोस्तु। 1 फरवरी को आपके 34 वें अवतरण दिवस पर हम यही भावना भाते है कि आप परंपरा से निर्वाण पद को प्राप्त करें। और हम सभी को भी सम्यक मार्ग प्रशस्त करें। सतत संयम में वृद्धि, आरोग्य एवं पूर्णाय जीवन की हम सब अभिलाषा करते हैं।

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