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मुनिश्री प्रणुत सागर जी मुनिराज ने कहा धर्म से ही सुख मिलता है : मुनिश्री ने प्रवचन में कर्म फल की विशद विवेचना की 


बड़वानी नगर में विराजित पट्टाचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज के शिष्य श्रमण मुनि श्री प्रणुत सागर जी महाराज ने सोमवार को दिगंबर जैन मंदिर में भगवान के दर्शन किए। मुनिश्री के सानिध्य में भगवान के अभिषेक किया गया और शांतिधारा हुई। धामनोद से पढ़िए, दीपक प्रधान की यह खबर…


धामनोद। बड़वानी नगर में विराजित पट्टाचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज के शिष्य श्रमण मुनि श्री प्रणुत सागर जी महाराज ने सोमवार को दिगंबर जैन मंदिर में भगवान के दर्शन किए। मुनिश्री के सानिध्य में भगवान के अभिषेक किया गया और शांतिधारा हुई। मुनिश्री ने धर्मसभा में कहा कि आप को जो कुछ मिला है और मिल रहा है। सब धर्म के अनुसार मिल रहा है। आपने धर्म किया है तो सुख मिल रहा है। यदि पाप किए है तो दुःख मिल रहा है। मुनिराज ने कहा कि आप खुद अंतर्मन से सोचना कि कोई दो व्यक्ति एक जैसा सामान का व्यापार कर रहे हैं और एक की दुकान पर ग्राहकों की भीड़ लगी है और दूसरे की दुकान पर बमुश्किल कोई ग्राहक आ रहा है तो ये निश्चित है जिस व्यक्ति के दुकान पर ग्राहकों की भीड़ है, उसने पिछले जन्म में पुण्य कार्य धर्म कार्य किया है। इसलिए उसकी दुकान पर भीड़ है और जिसकी दुकान पर ग्राहकों की कमी है, उसके धर्म करने में कमी थी या पाप कार्य किए थे। धर्म का सबसे बड़ा फल तो ये मानो कि आपको ईश्वर ने मनुष्य जीवन दिया। उसमें भी उच्च कुल,परिवार दिया। साथ ही आपके शरीर के सब अंग अच्छे हैं। यदि आपमें कुछ भी कमी है तो उसकी वजह आप खुद हैं।

 अच्छा कुल, अच्छा समाज चाहिए तो धर्म कार्य में लग जाएं

मुनिश्री ने कहा कि आपके कर्म का उदय में आना है। आज के समय में भगवान सभी बनना चाहते हैं पर भगवान की सुनते कोई नहीं। अभी आप बासा खा रहे हो। पिछले पुण्य के उदय से आपका सबकुछ अच्छा चल रहा है। यदि थोड़ा सा भी विपरीत समय आए तो समझ लेना कि हमारे पाप कर्म उदय में आ रहे है और इन उदय कर्मों को समता से झेल लेना और प्रभु की भक्ति, धर्म साधना में लगा देना। साथ ही जिन लोगों का भी पुण्य प्रबल चल रहा है और हर सुख सुविधा भोग रहे हो तो ये मत समझ लेना कि हम बहुत पुण्यशाली है। यदि पुनः अच्छी योनि में जन्म लेना है। अच्छा कुल, अच्छा समाज चाहिए तो धर्म कार्य में लग जाएं।

मुनिश्री ने एक बहुत बड़े व्यापारी का दृष्टांत देकर बताया कि एक अजेन व्यक्ति भी जैन धर्म में आस्था और विश्वास रखता था वो कई करोड़ों का मालिक था। वो बिल्कुल अनपढ़ था। अभी कुछ वर्षों पहले ही वो पढ़ना और लिखना सीखा ,इसके पूर्व वो व्यक्ति बिल्कुल अंगूठा छाप था। अतः यहां ये भी बात है कि यदि आपका पुण्य जोरदार है तो आप अनपढ़ भी है तो भी आप पैसे वाले बन सकते हैं। अतः धर्म कीजिए जिससे आने वाले भव में आपको सुखों की प्राप्ति हो। मुनि श्री ने बताया कि आप एक गिलास पानी में एक चम्मच नमक मिलाएंगे और उसको पियेंगे तो उससे आपको उल्टी या दस्त हो जाएंगे और उस नमक का खारापन दबाने के लिए आपको कम से कम सात से आठ चम्मच शकर मिलाना पड़ेगी तब जाकर उसका खारापन दूर होगा।

जब पाप कर्म उदय में आते है तो वो कष्ट देते हैं 

मुनिश्री ने कहा कि ठीक वैसा ही आपका थोड़ा सा किया गया पाप को कम करने के लिए आपको कई गुना धर्म या पुण्य कार्य करना होगा और आपने यदि पाप किए है तो उसे आप अगले जन्म में भोगने के लिए भी तैयार रहना क्योंकि, पाप किसी को छोड़ता नहीं है। यदि कोई आज गलत कार्य करके सुखी हैं तो ये मान के चलिए कि अभी उसका पिछला पुण्य चल रहा है। इसलिए वो बुरे कार्य में भी सुख भोग रहा है किन्तु, जब पाप कर्म उदय में आते है तो वो कष्ट देते हैं और रुलाते भी हैं, अतः धर्म कीजिए निश्चित ही सुख ही सुख मिलेगा। इस अवसर पर समाज के महिला, पुरुष, युवा उपस्थित थे। यह जानकारी मनीष जैन ने दी।

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