सागर में विराजित मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने नए साल के प्रथम दिन स्थानीय दिगंबर जैन जिनालय में उपस्थित जैन समाज के गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए जीवन के कई सूत्रों के बारे में बताया। उन्होंने अपने प्रवचनों के माध्यम से समय का सदुपयोग और जीवन को संयमपूर्ण जीने की कलाओं के बारे में बताया। पढ़िए सागर से राजीव सिंघई मोनू की यह खबर…
सागर। व्यक्ति सुबह उठता है, अधूरा रहता है, कुछ करने का मन रहता है लेकिन, दिन भर में कुछ ऐसा करना चाहिए कि शाम होने के पहले उसको अनुभव में आ जाए कि मैं पूर्ण हो गया हूं। मैंने जो सोचा था वह सब कुछ मैंने कर लिया और उसका अंत समय विश्राम दिशा में होना चाहिए। महीना खत्म होने के पहले हमें एक दिन पहले से ही अपने माह की पूर्णता का अनुभव होना चाहिए। इस माह में जो सोचा था वह सब कुछ हो गया। ऐसे ही ये वर्ष खत्म होने से पहले हमें अपने आप में पूर्णता का अनुभव करना है और 31 तारीख सुरक्षित रखना है। जितने कार्य हुए दूसरों ने हम पर उपकार किए, उनको हमें थैंक्स कहना है। हमें अपनी जिंदगी को थैंक्स कहना है कि हे जिंदगी! हे आयु! हे कर्म! तुझे बहुत-बहुत शुक्रिया, जो तूने मुझे 1 साल पूर्ण करने का मौका दिया।
सबसे क्षमा मांगकर संबंध पूर्ण करें
ऐसे ही जब जिंदगी की शाम हो, शाम होने के पहले हमें थैंक्स कहना है। शास्त्रों में है जिसे कहते हैं समाधि, सब कुछ क्षमा करके सबसे क्षमा मांग कर, सारे संबंधों को पूर्णता का रूप देकर मरना है। जो हमारी जिंदगी में आया वह भी अहो भाग्यशाली मान रहा है और मेरी जिंदगी में जो आया है, मैं भी भाग्यशाली हूं। कितनी उपकारी है प्रकृति, हर दिन के बाद रात करती है क्योंकि, दिन को फिर पुनः मुहूर्त करती है।
प्रातःकाल नहीं होता तो मंगल बेला नहीं होती
वहीं सूर्य तुम्हे मुहूर्त देने आया था, तुम कर पाए या नहीं कर पाए, रात भर प्रकृति अंधेरे में रहकर के उसी सूर्य को प्रातःकाल निकालकर के तुम्हें फिर मंगलाचरण का सौभाग्य देती है। यदि रात नहीं होती तो प्रातःकाल नहीं होता और प्रातःकाल नहीं होता तो मंगल बेला नहीं होती।
बे-लिबास आए थे हम दुनिया में
प्रकृति ने कितने मौके दिए हमें, 2024 तुम्हें पुराना लगने लगा। लो मैं नए साल के रूप में एक साल और देता हूं, तुम्हें अपनी जिंदगी बोर लगने लगी, लो मैं परिवर्तन करके पुनः एक नया जीवन देता हूं लेकिन, हम ऐसे कितने जीवन निकाल पाएंगे। कितनी बार हमें प्रकृति मौका देगी। बे-लिबास आए थे हम दुनिया में, एक कफ़न के लिए इतनी बड़ी जिंदगी निकाल दी। ये साल भी शुरुआत हुई है।
सबका आशीर्वाद लेते हुए जन्मे थे
इस बार कुछ ऐसा संकल्प करना है, कुछ ऐसा करने का मन बनाना है कि ये कह सके इसने दानव से इंसान बनने में जिंदगी गुजार दी। मैंने इंसान से भगवान बनने में जिंदगी गुजार दी। क्या कभी किया कि अपूज्य बनकर जन्मे थे, पूज्य बनकर मरोगे, सबसे छोटे बनकर जन्मे थे, सबसे बड़े होकर मरोगे, सबका आशीर्वाद लेते हुए जन्मे थे, सबको आशीर्वाद देते हुए मरोगे क्या यह तुम्हारी जिंदगी का सफर हुआ। हमेशा नारी की जिंदगी में ऐसी कोई स्थिति न आए, जहां असुरक्षित हो तो नारियों को हमेशा वहां दान देना चाहिए। जहां देव, शास्त्र और गुरु की सुरक्षा हो और वो काम महिलाओं को ही करना चाहिए। सुरक्षा दिवाली पुरुषों को नहीं महिलाओं को ही बनाना चाहिए। इसलिए कि जो तीर्थ की सुरक्षा करेंगे, उसकी जिंदगी भर सुरक्षा रहेगी।













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