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घर में एक पवित्र स्थान जरूर बनाओः मुनिश्री ने दी तनाव मुक्त जीवन जीने और धर्म करने की सलाह


निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज की अमृतवाणी जैन श्रावकों के लिए बहुत पुण्यकारी साबित हो रही है। उनके प्रवचनों में रोज जीवन, धर्म और संयम के साथ संस्कारों की शिक्षाप्रद बातों और संदेशों का उपस्थित जैन समुदाय भरपूर लाभार्जन कर रहा है। पढ़िए सागर से राजीव सिंघई की यह खबर…


सागर। जब व्यक्ति सारी जिंदगी समस्याओं का समाधान नहीं कर पाता, ऐसी स्थिति में व्यक्ति किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है, डिप्रेशन में आ जाता है, जिंदगी से उदासीन हो जाता है, बस यही से होती है धर्म की शुरुआत। यहीं से आवश्यकता पड़ती है भगवान की, गुरुओं की और बड़े लोगों की। धर्म की कोई जरूरत नहीं होती। कुछ स्थान ऐसे होते है, जहां व्यक्ति किंचितमात्र भी धर्म नहीं करते, वो भी सुखी रहते हैं। उनकी जिंदगी में मां-बाप, परिवार भी नहीं होते, फिर भी वो अनाथ नहीं होते।

..हमें स्वयं अच्छा बनाना है

डॉक्टर नहीं होते फिर भी वो बीमार नहीं होते। किंचित मात्र भी उनके असाताकर्म का उदय नहीं होता असंख्यात वर्षों तक। जिन्हें कहते हैं भोगभूमि लेकिन, जहां किंचितमात्र भी दुःख न हो वहां मोक्ष नहीं होता। किस्मत से मिलने वाला सुख हमें धर्म से वंचित कर देता है। हमें अपनी किस्मत अच्छी नहीं बनाना है, हमें स्वयं अच्छा बनाना है।

अपने संकल्प से अपने लिए पवित्र स्थान चुनो

तीन लोक में एक भी स्थान ऐसा नहीं है, जो अच्छे लोगों के लिए बनाया गया हो। ठसाठस भरे हैं पापी लोग। सुई की नोक के बराबर भी अच्छा स्थान नहीं और पवित्र स्थान के बिना पवित्रता आ नहीं सकती। तुम्हें पवित्रता चाहिए है तो इस दुनिया में कोई भी पवित्र स्थान नहीं, तुम खुद पुरुषार्थ करके अपने मन से, अपने संकल्प से, अपने लिए पवित्र स्थान चुनो।

संकल्प करें कोई पाप नहीं करेंगे

दुनिया पाप करें तो करें, दुनिया के लिए ये पापी क्षेत्र है, तुम्हारे लिए ये पुण्यात्मा क्षेत्र बनाओ। तुम्ही संकल्प कर लो कि इस क्षेत्र पर मैं कोई पाप नहीं करूंगा, इस क्षेत्र को तुम पवित्र बनाओ, पवित्र है नहीं, हमें खुद बनाना है, इस स्थान को हम पवित्र बनाते हैं और हम संकल्प करते हैं कि इस स्थान पर हम कोई पाप नही करेंगे, इस स्थान पर हम गंदे शरीर से नहीं जाएंगे। स्थान पर हम कोई भी गंदा कार्य नहीं करेंगे, यहां तक कि झूठे मुंह भी नही जाएंगे।

अच्छे मन से जाते हैं पॉजिटिव एनर्जी डेवलप होती है

वास्तु का बहुत बड़ा कांसेप्ट है कि तुम्हें एनर्जी पवित्र स्थान से मिलती है और पवित्र स्थान दुनिया में है नहीं, तुम अपने घर में थोड़ा सा संकल्प किया करो, बड़ा घर नहीं है तो एक आले को करो, कुछ भाग को आप पवित्र घोषित करो, जिसे पूजा स्थल कहते हैं और जब हम पूजा का स्थल बना लेते हैं तो हम वहां बहुत अच्छे कार्य करते हैं। अच्छे मन से जाते हैं तो हमारे पूरे घर के लिए एनर्जी डेवलप होती है। वो हमारे काम आएगी, पड़ोस के काम नहीं आएगी।

बुरे भाव नहीं करेगा झगड़ा नहीं करेगा…

किसी उद्देश्य को लेकर कहा कि तुम सारे नगर में व्यापार धंधा करते हो, राग द्वेष करते हो, जहां तुम्हारे परिणाम न बिगड़ते हो, जहां तुम अशुभ कार्य न करते हो। तब ऋषि मुनियों ने कहा पूरे नगर में एक स्थान मिल बैठकर चुन लो और एक स्थान घोषित करो जहां पूरी नगर का कोई भी व्यक्ति पाप नहीं करेगा, बुरे भाव नहीं करेगा झगड़ा नहीं करेगा, राग द्वेष नहीं करेगा। जिस नगर में एक भी स्थान पवित्र नहीं होता। वह नगर ज्यादा दिन नहीं टिकता, उस नगर में धर्म और धर्मात्मा का स्थान नहीं रहता, वैसे तो तुम मानोगे नही तो ऋषि-मुनियों ने कहा उस स्थान को मंदिर घोषित करा दो।

जहां मंदिर नहीं वहां हमारे बच्चों की सुरक्षा नहीं

जैनियों की महिलाएं पहले एक ही बात पूछती थीं, तुम्हारी नौकरी कहां है, तुम धंधे पर कहीं जा रहे हो तो जाओ, पहले बताओ वहां मंदिर है कि नहीं। जहां मंदिर नहीं वहां हमारे और हमारे बच्चों की सुरक्षा नहीं संस्कार नही तो सज्जन लोगों को हमेशा ध्यान रखना चाहिए, जिस नगर में देवता का स्थान न हो, वह नगर यदि सोने का भी हो तो वहां वास नहीं करना क्योंकि, वहां के लोग, वहां का नगर पवित्र स्थान से घोषित नहीं है। इसलिए ये मंदिरों की परंपरा चली। जितने भी देवता है असंख्यात तो उनके लिए उतने ही मंदिर है। आप जहां भी हो, वहां एक नगर का मंदिर हो और नहीं हो तो मंदिर बना लेना। कॉलोनी में प्लाट लेना तो पूछना मंदिर है क्या? मंदिर बनेगा क्या, अन्यथा तुम्हारी जिंदगी भले तुम कितने ही सुखी रह जाना, अंत तुम्हारा बुरा होगा।

फोटो छाया है, पूज्य नहीं होती

यदि आप घर तक सीमित है, आप डरे नहीं, आपके घर के छोटे से स्थान को पवित्र स्थान घोषित कर दें, वहां एक स्वस्तिक बना देना, भगवान, गुरु की फोटो, एक मंगल कलश स्थापित कर देना और नियम ले लेना कि इस स्थान पर मैं कभी गंदा नहीं करूंगा, गंदे शरीर से नहीं आऊंगा। फोटो का कोई रेडियस नहीं होती, फोटो छाया है, पूज्य नहीं होती। पवित्र स्थान और भगवान के स्थान में अंतर है, पवित्र स्थान जितना घोषित करो उतने में ही रह जाता है लेकिन पवित्र आत्माएं जितने में बैठती हैं उतना नहीं, जितना उनकी साइज है उससे 12 गुना क्षेत्र चारों ओर पवित्र क्षेत्र चाहिए। वहां आप कोई गंदा कार्य नहीं कर सकते, आप शयन, भोजन नहीं कर सकते, आप जूते चप्पल नहीं उतार सकते। इसलिए कभी घरों में पवित्र आत्मा को मत बैठाना क्योंकि पवित्र आत्मा का ओरा बड़ा होता है। जो दीवाल हो, वह इतनी मजबूत बनाओ कि उसे मंदिर का आभामंडल भी तुम्हारी दीवाल में प्रवेश न कर जाए।

जो कुछ भी करोगे, वह मंदिर तुम्हें संभालेगा

अब यदि तुम चाहते हो कि मेरा व्यापार तो घर से बाहर भी है। पूरे नगर से आप आजीविका करते हैं, पूरे नगर से आपका व्यापार चलता है तो किसी स्थान को पवित्र स्थान घोषित कर देना, तुम पूरे नगर में जो कुछ भी करोगे, वह मंदिर तुम्हें संभालेगा। संकल्प करूं मैं पूरे नगर में अपना व्यापार धंधा, कषाय सब करूंगा, मैं बिना कषाय के रह नहीं सकता, सब करो लेकिन एक संकल्प करों भगवान मैं नियम लेता हूं मेरी कॉलोनी में जो मेरे नगर का मंदिर है। उस मंदिर में मैं कोई भी गलत कार्य नहीं करूंगा, न करने दूंगा क्योंकि, इस मंदिर को मैं अपना मानता हूं, हमारे पूर्वज मानते थे। हमारे बच्चे भी मानेंगे अन्यथा बर्बाद हो जाओगे फिर कहोगे कि हमारे पूर्वजों ने मंदिर बनाया था। कषाय होती है तो उस मंदिर की मीटिंग में मत जाओ।

श्रीफल चढ़ाए बिना कार्य मत करना

नगर का खतरा है तो तुम्हारा इष्ट चैत्यालय हो जाएगा और इष्ट बनाने का अर्थ है कि सुबह उठकर उनके दर्शन के बिना कोई कार्य मत करना, जब भी कोई कार्य करो वहां श्रीफल चढ़ाए बिना कार्य मत करना। भगवान से तुम्हें यदि रिलेशन बनाना है तो जब भी कोई शुभ कार्य हो तो भगवान को आमंत्रित करो। जब कभी तुम बाहर जाओगे तो अपने इष्ट देवता से कह कर जाओगे और जब आओगे तो उनका आभार मानकर घर मे जाओगे। ये दो कार्य जरूर करना। क्या तुम्हें नगर के बाहर खतरा है। नगर के बाहर जाते हो तो जितने एरिया से आपका संबंध है, एक तीर्थ क्षेत्र भी बना लेना।

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