अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज के सानिध्य में पर्युषण पर्व के सातवे दिन श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, संविद नगर, कनाडिया रोड पर मुनि श्री ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि तप को अध्यात्म का मूल माना गया है। तप शरीर को कष्ट देकर किया जाता है। पढ़िए रेखा संजय जैन की यह विशेष रिपोर्ट…
इंदौर। अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज के चातुर्मास धर्म प्रभावना रथ के चतुर्थ पड़ाव के 14वें दिन व पर्युषण पर्व के सातवे दिन श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, संविद नगर, कनाडिया रोड पर बड़े ही हर्षोल्लास के साथ धर्म प्रभावना हुई।
सर्वप्रथम श्रीजी के अभिषेक और शांति धारा हुई। तत्पश्चात मंगलाचरण की प्रस्तुति सुनीता जैन ने दी। मुनि श्री के पाद प्रक्षालन और शास्त्र भेंट के पुण्यार्जक रूपेश , खुशबू जैन, डॉक्टर देवेंद्र जैन धनोते परिवार (पिपलगोन वाले) रहे।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री ने कहा दसलक्षण धर्म का सातवां कदम यानी ‘उत्तम तप धर्म’। तप को अध्यात्म का मूल माना गया है। तप शरीर को कष्ट देकर किया जाता है।
जैसे सोने को तपाकर आभूषण बनाए जाते हैं उसी तरह शरीर को तपाकर ही आत्मा को परमात्मा बनाया जा सकता है। सोना तब तक ही स्वर्ण रहता है जब तक वह तिजोरी में बंद था।
जब वह तपकर गहना बन गया और शोरूमों की शान बढ़ाने लगा तो लोगों की आंखों का नूर हो गया, प्रशंसा का पात्र बन गया। उसी तरह भले ही तप करने से शरीर को कष्ट होता हो, परेशानी होती हो लेकिन उसके बाद तो आत्मा पूज्यता को प्राप्त हो जाती है।
कोयले को सफेद बनाने की शक्ति संसार में किसी के पास है तो वह है अग्नि में। जब वह कोयला अग्नि की संगति कर लेता है वह कोयला राख बनकर सफेद हो जाता है।
व्यक्ति संतुलित भोजन, ध्यान, बड़ों का सम्मान, पापों को स्वीकारोक्ति और गुरु सेवा के माध्यम से जीवन में तप को बढ़ा सकता है। तप शक्ति परीक्षण स्थल है, जो इसमें पास हो गया, वह मोक्ष को प्राप्त करने का हकदार हो जाता है।
ये भी रहे मौजूद
इस अवसर पर धर्म सभा में समाज अध्यक्ष एल.सी. जैन, सचिव महावीर जैन, पवन मोदी, महावीर सेठ, सत्येंद्र जैन, आनंद पहाड़िया, राजेश जैन, लाल मंदिर कनाडिया रोड महिला मंडल, कमलेश जैन, टीना जैन व अन्य समाजजन मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन महावीर जैन ने किया।













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