समाचार

भगवान महावीर के निर्वाण और गौतम स्वामी के केवलज्ञान से जुड़ा जैन दीपावली पर्व : दीपावली को लौकिक और परमार्थिक दोनों दृष्टियों के साथ खुशी से मनायें” — मुनि श्री प्रमाणसागर जी


मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज ने दीपावली पर्व पर जैन परंपरा के लौकिक और परमार्थिक दोनों पक्षों को उजागर करते हुए कहा कि यह पर्व भगवान महावीर के निर्वाण और प्रथम गणधर गौतम स्वामी के केवलज्ञान का प्रतीक है। उन्होंने समाज को कर्तव्य, पितृभक्ति और संस्कारों का संदेश दिया। पढ़िए अविनाश जैन विद्यावाणी की रिपोर्ट…


जैन परंपरा में दीपावली का पर्व भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण तथा उनके प्रथम गणधर गौतम स्वामी के केवलज्ञान दिवस से जुड़ा हुआ है। मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि दीपावली को हमें लौकिक (सांसारिक) और परमार्थिक (आध्यात्मिक) दोनों दृष्टियों से आनंदपूर्वक मनाना चाहिए।

मुनिसंघ के प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि इस वर्ष अमावस्या की तिथि 20 और 21 अक्टूबर दोनों दिवस पड़ रही है। मुनि श्री ने स्पष्ट किया कि जैन ज्योतिष के अनुसार जो तिथि सूर्योदय के समय विद्यमान होती है, वही पूरे दिन मानी जाती है। अतः 20 अक्टूबर को चतुर्दशी उदयकाल में है, इसलिए उस दिन को चतुर्दशी मानना चाहिए, जबकि 21 अक्टूबर की प्रातः बेला में अमावस्या होगी। इस कारण जैन परंपरा में 21 अक्टूबर की सुबह भगवान महावीर का निर्वाण महोत्सव मनाया जाएगा और उसी दिन सायंकाल गौतम गणधर स्वामी के केवलज्ञान की प्राप्ति के उपलक्ष्य में दीप प्रज्वलन किया जाएगा।

दीपावली को आत्मशुद्धि और संस्कारों के रूप में मनाना चाहिए

मुनि श्री ने कहा कि दीपावली के अवसर पर सोलह कारणों के प्रतीक स्वरूप 16 दीपक चार-चार बातियों के साथ जलाने चाहिए। घरों और दुकानों की शुद्धि कर दीपावली को आत्मशुद्धि और संस्कारों के रूप में मनाना चाहिए।

उन्होंने धर्मसभा में जीवन के मूल्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि “पिता कर्तव्यनिष्ठ होगा तो संतान संस्कारवान बनेगी और संतान कर्तव्यनिष्ठ होगी तो पितृभक्ति अपने आप उभरेगी।” मुनि श्री ने कहा कि यदि पिता संस्कार न दे तो बेटे का भविष्य बिगड़ता है, और यदि बेटा योग्य होते हुए भी पिता को वृद्धाश्रम भेजे तो पिता का भविष्य बिगड़ जाता है।

मुनि श्री ने अधिकार और कर्तव्य के संतुलन को समझाते हुए कहा कि “श्रीराम में अयोध्या के राजा बनने की सभी योग्यताएँ थीं, परंतु उन्होंने अपने पिता की प्रतिष्ठा को बचाने के लिए अधिकारों का त्याग कर कर्तव्य का पालन किया।” उन्होंने स्व-रचित पंक्तियाँ सुनाईं —

“कर्तव्यों की हीनता अधिकारों का नर्तन, कल और आज में बस इतना ही परिवर्तन।”

मुनि श्री ने कहा कि परिवार में पिता-पुत्र, भाई-भाई, देवरानी-जिठानी — यदि सभी अपने कर्तव्यों का पालन करें तो परिवार में सुख और एकता बनी रहती है। ईर्ष्या, द्वेष और प्रतिस्पर्धा से जीवन दुखमय हो जाता है।

पुरुषार्थ करो, परिणाम की चिंता मत करो

प्रोफेशनल युवाओं को संबोधित करते हुए मुनि श्री ने कहा, “दूसरे को खुश करने के लिए काम मत करो, अपने मन की खुशी से काम करो — जब तुम स्वयं खुश रहोगे तो दुनिया भी खुश रहेगी।” उन्होंने कहा, “पुरुषार्थ करो, परिणाम की चिंता मत करो।”

मुनि श्री ने अंत में कहा कि व्यापार या जीवन के किसी भी क्षेत्र में लक्ष्य निर्धारित करना अच्छी बात है, परंतु यदि लक्ष्य पूरा न हो पाए तो संतोष रखना चाहिए। असंतोष से मन विचलित होता है और नुकसान बढ़ता है।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
1
+1
0
+1
0
Shreephal Jain News

About the author

Shreephal Jain News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page