दिगंबर जैन धर्म के सातवें तीर्थंकर भगवान श्री सुपार्श्वनाथ जी का मोक्ष कल्याणक इस वर्ष 8 फरवरी को है। तिथि के अनुसार भगवान का मोक्ष कल्याणक फाल्गुन कृष्ण सप्तमी के दिन मनाया जाता है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला के तहत आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति…
इंदौर। दिगंबर जैन धर्म के सातवें तीर्थंकर भगवान श्री सुपार्श्वनाथ जी का मोक्ष कल्याणक इस वर्ष 8 फरवरी को है। तिथि के अनुसार भगवान का मोक्ष कल्याणक फाल्गुन कृष्ण सप्तमी के दिन मनाया जाता है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में संपूर्ण भक्ति भाव से भगवान सुपार्श्वनाथ जी के मोक्ष कल्याणक अवसर पर अभिषेक, शांतिधारा, अर्घ्य समर्पण और निर्वाण लाडु आदि चढ़ाने के धार्मिक विधान किए जाते हैं। मंदिरों में
जैन धर्म के सातवें तीर्थंकर भगवान सुपार्श्वनाथ जी का मोक्ष कल्याणक अत्यंत भक्ति भाव से मनाया जाता है। इनका मोक्ष कल्याणक प्रतिवर्ष फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को आता है। वर्ष 2026 में यह तिथि 8 फरवरी को है। भगवान ने सम्मेद शिखरजी (झारखंड) पर्वत के प्रभास कूट से निर्वाण प्राप्त किया था। मान्यता है कि भगवान सुपार्श्वनाथ जी के साथ 1 हजार मुनिराजों ने भी मोक्ष प्राप्त किया था। इस दिन दिगंबर जैन समाज के श्रद्धालु और भक्तजन मोक्ष सप्तमी मनाएगा। इस दिन जैन मंदिरों में भगवान की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और निर्वाण लाडू चढ़ाया जाता है। ग्रंथों में वर्णित जानकारी के अनुसार भगवान सुपार्श्वनाथ जी का निर्वाण शिखरजी में प्रभास कूट पर हुआ था। आज के ही दिन सूर्याेदय के समय विशाखा नक्षत्र में 1 हजार मुनिराजों के साथ मोक्ष पद को प्राप्त किया था। इस कूट से 49 कोड़ा-कोड़ी 84 करोड़ 72 लाख 7 हजार 742 मुनि सिद्ध हुए।
इनके चरणों में स्वस्तिक चिह्न था
सातवें तीर्थंकर भगवान इस अवसर्पिणी काल के दुरूषमा-सुषमा चौथे काल में उत्पन्न हुए थे। जंबूदीप के भरतक्षेत्र में काशी देश की वाराणसी नगरी के राजा सुप्रतिष्ठ की रानी पृथ्वीसेना के गर्भ में ये भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दिन विशाखा नक्षत्र में स्वर्ग से अवतरित हुए थे। इनका जन्म ज्येष्ठ शुक्ला द्वादशी के दिन अग्निमित्र नामक शुभ योग में हुआ था। इनका यह नाम जन्माभिषेक करने के पश्चात् इंद्र ने रखा था। इनके चरणों में स्वस्तिक चिह्न था। इनकी आयु बीस लाख पूर्व वर्ष की थी। शरीर दो सौ धनुष ऊँचा था। इन्होंने कुमारकाल के पांच लाख वर्ष बीत जाने पर धन का त्याग (दान) करने के लिए साम्राज्य स्वीकार किया था। इनके निरूस्वेदत्व आदि आठ अतिशय तथा पद्मपुराण और हरिवंशपुराण के अनुसार दश अतिशय प्रकट हुए थे।
सोमखेट नगर के राजा महेंद्रदत्त ने इन्हें आहार दिया
इनकी आयु अनपवर्त्य थी। वर्ण प्रियंगु पुष्प के समान था। बीस पूर्वांग कम एक लाख पूर्व की आयु शेष रहने पर इन्हें वैराग्य हुआ। ये मनोगति नामक शिविका पर आरूढ़ होकर सहेतुक वन गए तथा वहां इन्होंने ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी के दिन सायं बेला में 1 हजार राजाओं के साथ संयम धारण किया। संयमी होते ही इन्हें मनरूपर्ययज्ञान हुआ। सोमखेट नगर के राजा महेंद्रदत्त ने इन्हें आहार दिया था। ये छद्मस्थ अवस्था में नौ वर्ष तक मौन रहे। सहेतुक वन में शिरीष वृक्ष के नीचे फाल्गुन कृष्ण षष्ठी के दिन सायंकाल के समय इन्हें केवलज्ञान हुआ था। इनके चतुर्विध संघ में 95 गणधर, 2 हजार 30 पूर्वधारी, 2 लाख 44 हजार 920 शिक्षक, 9 हजार अवधिज्ञानी, 11 हजार केवलज्ञानी, 15 हजार 300 विक्रिया ऋद्धिधारी, 9 हजार 150 मनरूपर्ययज्ञानी, 8हजार 600 वादी। इस प्रकार कुल 3 लाख मुनि, 3 लाख 30 हजार आर्यिकाएं, 3 लाख श्रावक, 5 लाख श्राविकाएं असंख्य देव-देवियां और संख्यात तिर्यंच थे।
आयु का एक मास शेष रहने पर ये सम्मेदशिखर पहुंचे
विहार करते हुए आयु का एक मास शेष रहने पर ये सम्मेदशिखर पहुंचे और यहां एक हजार मुनियों के साथ इन्होंने प्रतिमायोग धारण कर फाल्गुन कृष्ण सप्तमी के दिन विशाखा नक्षत्र में सूर्याेदय के समय मोक्ष प्राप्त किया था। दूसरे पूर्वभव में ये धातकीखंड के पूर्व विदेहक्षेत्र में सुकच्छ देश के क्षेमपुर नगर के नंदिषेण नामक नृप थे। प्रथम पूर्वभव में मध्यम ग्रैवेयक के सुभद्र नामक मध्यम विमान में अहमिंद्र रहे।













Add Comment