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प्रथम तीर्थंकर भगवान श्री आदिनाथ का 28 जनवरी को है मोक्ष कल्याणकः भगवान ने दिया कृषि करो या ऋषि बनो का सूत्र वाक्य 


जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ का जन्म चौत्र कृष्ण नवमी को सूर्याेदय के समय हुआ था। उन्हें ऋषभदेव जी, ऋषभनाथ भी कहा जाता है। ऋषभदेव आदिनाथ भगवान का जन्म युग आदि में राजा नाभिराय जी के यहां माता मरू देवी की कोख में हुआ था। भगवान ने माघ कृष्ण चतुर्दशी के दिन उन्होंने निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया। भगवान आदिनाथ का मोक्ष कल्याणक इस साल 28 जनवरी को आ रहा है। इस दिन भगवान आदिनाथ के अतिशय क्षेत्र सहित अन्य तीर्थों में भव्य मोक्ष कल्याणक मनाया जाएगा। दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान की आराधना, महामस्तकाभिषेक, शांतिधारा,अर्घ्य आदि अर्पित कर विधान किए जाएंगे। मोक्ष कल्याण पर श्रीफल जैन न्यूज भगवान आदिनाथ पर इस बार विशेष जानकारी श्रीजी भक्तों के लिए लाए हैं। पढ़िए श्रीफल जैन न्यूज की यह विशेष प्रस्तुति…


भगवान आदिनाथ का अर्घ्य

जल फलादि समस्त मिलायके, जजत हूं पद मंगल गायके।

भगत वत्सल दीनदयाजी, करहु मोहि सुखी लखि। 


इंदौर। जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ का जन्म चौत्र कृष्ण नवमी को सूर्याेदय के समय हुआ था। उन्हें ऋषभदेव जी, ऋषभनाथ भी कहा जाता है। ऋषभदेव / आदिनाथ भगवान का जन्म युग आदि में राजा नाभिराय जी के यहां माता मरूदेवी की कोख में हुआ था। उन्हें जन्म से ही संपूर्ण शास्त्रों का ज्ञान था। वे समस्त कलाओं के ज्ञाता और सरस्वती के स्वामी थे। युवा होने पर कच्छ और महाकच्छ की दो बहनों यशस्वती (या नंदा)और सुनंदा से उनका विवाह हुआ। नंदा ने भरत को जन्म दिया, जो आगे चलकर चकवर्ती सम्राट बने। उन्हीं के नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा। (जैन धर्मावलंबियों की ऐसी मान्यता है)

प्रजा की सभी जरूरतों को कल्पवृक्ष पूरा करते थे

आदिनाथ सौ पुत्रों और ब्राह्मी तथा सुंदरी नाम की दो पुत्रियों के पिता बने। भगवान ऋषभनाथ ने ही विवाह संस्था की शुरुआत की और प्रजा को पहले-पहल असि (सैनिक कार्य) मसि (लेखन कार्य) कृषि (खेती), विद्या (शिल्प, विविध वस्तुओं का निर्माण और वाणिज्य-व्यापार) के लिए प्रेरित किया। कहा जाता है कि इसके पूर्व तक प्रजा की सभी जरूरतों को कल्पवृक्ष पूरा करते थे। उनका सूत्र वाक्य था कृषि करो या ऋषि बनो।

भगवान श्री आदिनाथ को एक वर्ष तक भूखे रहना पड़ा

ऋषभनाथ ने हजारों वर्षों तक सुखपूर्वक राज्य किया। फिर राज्य को अपने पुत्रों में विभाजित कर दिगंबर तपस्वी बन गए। उनके साथ सैकड़ों लोगों ने भी उनका अनुसरण किया। जब कभी वे भिक्षा मांगने जाते, लोग उन्हें सोना, चांदी, हीरे, रत्न, आभूषण देते थे, लेकिन भोजन कोई नहीं देता था। इस प्रकार उनके बहुत से अनुयायी भूख बर्दाश्त नहीं कर सके और उन्होंने अपने अलग समूह बनाने आरंभ कर दिए। यह जैन धर्म में अनेक संप्रदायों की शुरुआत थी।

श्रेयांस ने भगवान को गन्ने का रस भेंट किया

जैन मान्यता के अनुसार पूर्णता प्राप्त करने से पूर्व तक तीर्थंकर मौन रहते हैं। अतः आदिनाथ को एक वर्ष तक भूखे रहना पड़ा। इसके बाद वे अपने पौत्र श्रेयांश के राज्य हस्तिनापुर पहुंचे। श्रेयांस ने उन्हें गन्ने का रस भेंट किया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। वह दिन आज भी अक्षय तृतीया के नाम से प्रसिद्ध है।

99 हजार वर्ष तक किया धर्म विहार

हस्तिनापुर में आज भी जैन धर्मावलंबी इस दिन गन्ने का रस पीकर अपना उपवास खोलते हैं। इस प्रकार एक हजार वर्ष तक कठोर तप करके ऋषभनाथ को केवल्य ज्ञान (भूत, भविष्य और वर्तमान का संपूर्ण ज्ञान) प्राप्त हुआ। वे जिनेंद्र बन गए। पूर्णता प्राप्त करके उन्होंने मौन व्रत तोड़ा और संपूर्ण आर्यखंड में लगभग 99 हजार वर्ष तक धर्म-विहार किया और लोगों को उनके कर्तव्य और जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति पाने के उपाय बताए। अपनी आयु के 14 दिन शेष रहने पर भगवान ऋषभनाथ हिमालय पर्वत के कैलाश शिखर पर समाधिलीन हो गए। वहीं माघ कृष्ण चतुर्दशी के दिन उन्होंने निर्वाण मोक्ष प्राप्त किया।

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