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मोक्ष सप्तमी पर पार्श्वनाथ भगवान का निर्वाण दिवस मनाया : गोपाचल पर्वत पर विराजित विश्व की सबसे ऊँची पद्मासन मूर्ति आज भी करती है चमत्कारी सुरक्षा


जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का मोक्ष कल्याणक दिवस मुकुट सप्तमी के पावन पर्व पर श्रद्धा, उपवास, शांतिधारा और निर्वाण कांड पाठ के साथ ग्वालियर में भावपूर्वक मनाया गया। पढ़िए सौरभ जैन की पूरी रिपोर्ट…


ग्वालियर (मध्य प्रदेश)। जैन धर्म के अनुसार श्रावण शुक्ल सप्तमी जिसे मुकुट सप्तमी भी कहा जाता है, इस दिन 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का मोक्ष कल्याणक दिवस होता है। इस अवसर पर ग्वालियर के इंजी. सौरभ जैन वरेह वाले अंबाह ने जानकारी दी कि इस वर्ष यह पावन पर्व 31 जुलाई को श्रद्धा और भक्ति भाव से मनाया गया। इस दिन श्रद्धालुओं ने भगवान पार्श्वनाथ का अभिषेक, शांतिधारा, विशेष पूजन, और निर्वाण कांड पाठ कर मोक्ष प्राप्ति की मंगल कामना की। प्रभु के प्रति आस्था के प्रतीक रूप में निर्वाण लाडू चढ़ाया गया। प्रवचन में कहा गया कि प्रभु का स्पर्श हमें केवल स्वर्ण नहीं बल्कि पारस बना देता है। मोक्ष की अवधारणा को जीवन का सार बताया गया। जब मनुष्य संसार में रहते हुए मोक्ष मार्ग पर अग्रसर होता है, तभी उसका जीवन सार्थक कहलाता है। इस दिन बालिकाएं निर्जला उपवास कर दिनभर पूजन, स्वाध्याय, मनन, प्रतिक्रमण एवं शाम को देव-शास्त्र-गुरु की सामूहिक भक्ति में लीन रहती हैं

ग्वालियर के ऐतिहासिक गोपाचल पर्वत की विशेषता

ग्वालियर का गोपाचल पर्वत जैन धर्म का अद्भुत धरोहर स्थल है। सं. 1398 से 1536 के मध्य इस पर्वत पर तोमर वंशीय राजाओं – वीरमदेव, डूंगरसिंह और कीर्तिसिंह के काल में हजारों विशाल जैन प्रतिमाएं खुदवायी गई थीं।

यह प्रतिमा दुनिया की सबसे ऊँची पद्मासन जैन प्रतिमा

सबसे विशेष प्रतिमा है — 42 फीट ऊँची पद्मासन पार्श्वनाथ जी की मूर्ति, जिसे मुगल सम्राट बाबर ने सं. 1557 में नष्ट करने का आदेश दिया था। लेकिन जैसे ही मूर्ति पर हथौड़े से प्रहार हुआ, एक दैवी चमत्कार हुआ जिससे विध्वंसक सैनिक भयभीत होकर भाग गए और प्रतिमा सुरक्षित बच गई। आज भी यह प्रतिमा दुनिया की सबसे ऊँची पद्मासन जैन प्रतिमा मानी जाती है। यदि इस धरोहर पर शासन और समाज ध्यान दे, तो यह भारत की ऐतिहासिक धरोहर को विश्वस्तरीय पहचान दिला सकती है।

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