जैन धर्म के आठवें तीर्थंकर श्री चंद्रप्रभु जी का मोक्ष कल्याणक 23 फरवरी को मनाया जा रहा है। तिथि के अनुसार वे फाल्गुन शुक्ल सप्तमी को ललित कूट से मोक्ष को गए थे। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति…
इंदौर। जैन धर्म के आठवें तीर्थंकर श्री चंद्रप्रभु जी का मोक्ष कल्याणक 23 फरवरी को मनाया जा रहा है। तिथि के अनुसार वे फाल्गुन शुक्ल सप्तमी को ललित कूट से मोक्ष को गए थे। भगवान चंद्रप्रभु जी के मोक्ष कल्याणक पर दिगंबर जैन मंदिरों में विशेष धार्मिक अनुष्ठान और अभिषेक, शांतिधारा, निर्वाण कांड पाठ तथा निर्वाण लाडू चढ़ाकर आराधना भक्ति की जा रही है। जैन धर्म के 8वें तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभु का मोक्ष कल्याणक दिवस सोमवार को भक्तिभाव से मनाया जा रहा है। इस मौके पर शहर के दिगंबर जैन मंदिरों में मंत्रोच्चार के साथ भगवान चंद्रप्रभु की अष्टद्रव्य से विशेष पूजा-अर्चना होगी। मोक्ष कल्याणक अर्घ्य एवं निर्वाण लाडू चढ़ाया जाएगा। इससे पहले श्रीजी के अभिषेक एवं विश्व में सुख समृद्धि एवं शांति की मंगल कामना के साथ शांतिधारा की जाएगी।
एक हजार महामुनिराजों के साथ मोक्ष
जैन धर्मग्रंथों के अनुसार भगवान चंद्रप्रभु जी एक माह के भोग निवृतिकाल से पूर्व श्री सम्मेद शिखरजी की इस पूरब में बनी ललितकूट पर पहुंचे और एक हजार महामुनिराजों के साथ फाल्गुन शुक्ल सप्तमी को सिद्धालय गए। भगवान चंद्रभु जी का तीर्थ प्रवर्तन काल 90 करोड़ सागर चार पूर्वांग रहा। जानकारी के अनुसार ललित कूट को 5 वर्ष पहले तीर्थ क्षेत्र कमेटी ने आकर्षक रूप दिया है। अब स्वर्ण भद्र कूट की तरह यहां की सीढ़ियां भी आरामदायक और चौड़ी हो गई हैं।
सातवें तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ जी के बाद हुआ था जन्म
तथ्यों के अनुसार तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभु जी का जन्म सातवें तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ जी के नौ सौ करोड़ सागर बीत जाने के बाद चंद्रपुर नगर में महारानी लक्ष्मणादेवी के गर्भ से पौष कृष्झा एाकदशी को हुआ था। आपकी आयु 10 लाख वर्ष पूर्व थी और कद उतंग 900फीट। उल्लेखनीय यह है कि ललितकूट से 984 अरब, 72 करोड़ 80 लाख 84 हजार 595 मुनिराज मोक्ष को गए हैं।
निर्मल भाव से वंदना का मिलता है फल
जैन धर्म की मान्यता है कि ललितकूट की निर्मल भाव से वंदना करने से 96 लाख प्रोषध उपवास का फल मिलता है। यह कूट जिस तरह पारस प्रभु के बिल्कुल पश्चिम में दाईं ओर आती है। यह कूट पूर्व में अन्य कूटों से 2 किमी दूर है। ऐसी मान्यता है कि भगवान की पवित्र आत्मा देश के झारखंड राज्य के शाश्वत सिद्धक्षेत्र श्री सम्मेद शिखर पर्वत में ललितकूट में बने चरण कमल से ऊर्ध्व में 7 राजू ऊपर सिद्ध शिला से 37लाख 87 हजार 498 धनुष एक हाथ ऊपर विराजमान है।











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