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जैन तीर्थंकर प्रतिमा पद्मासन में होती है ध्यान अवस्था की मुद्रा में : जैन ऋषि-मुनियों की दिनचर्या का महत्वपूर्ण हिस्सा है ध्यान योग


 एक समय था जब भारत भारतीयों की जीवन शैली का अभिन्न अंग हुआ करता था ध्यान योग परंतु समय बदला, परंपराएं बदलीं, जीवन शैली बदली और आधुनिकता की चकाचौंध में भारतीय अपनी मूल संस्कृति को भूलता गया। उस भूली हुई परम्परा को सहेजने और दुनियाभर में प्रचारित करने का उपक्रम कुछ महापुरुषों ने किया, जिसमें बाबा रामदेव एक जाना-पहचाना नाम है। इन्होंने दुनिया के करोड़ों लोगों को योग सिखाने का महत्व पूर्ण कार्य किया। पढ़िए अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष आलेख…


बदनावर। एक समय था जब भारत भारतीयों की जीवन शैली का अभिन्न अंग हुआ करता था ध्यान योग परंतु समय बदला, परंपराएं बदलीं, जीवन शैली बदली और आधुनिकता की चकाचौंध में भारतीय अपनी मूल संस्कृति को भूलता गया। उस भूली हुई परम्परा को सहेजने और दुनियाभर में प्रचारित करने का उपक्रम कुछ महापुरुषों ने किया, जिसमें बाबा रामदेव एक जाना-पहचाना नाम है। इन्होंने दुनिया के करोड़ों लोगों को योग सिखाने का महत्व पूर्ण कार्य किया।

उक्त जानकारी देते हुए वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने बताया कि भारत के प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने योग को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाने के लिए 27 सितम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने भाषण में विश्व समुदाय से एक आंतरराष्ट्रीय योग दिवस को अपनाने अपील की थी। उसके परिणाम स्वरूप 11 दिसम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र के 177 सदस्यों द्वारा 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को मनाने के प्रस्ताव को मंजूरी मिली। इस प्रकार 21 जून 2015 को पहला अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया।

ध्यान योग भारतवर्ष की मूलभूत परम्परा  

पाटोदी ने बताया कि ध्यान योग मुख्य रूप से एक ही सिक्के के दो पहलू है। शारीरिक योग से प्रारंभ होकर यह उपक्रम ध्यान की चरम सीमा तक पहुंचता है और मनुष्य अपनी अंतर्मन की बगिया में प्रवेश करने लगता है। यही योग की उत्कृष्ट अवस्था है। बाबा ने इसे प्रचारित किया परन्तु हजारों वर्ष प्राचीन परंपरा को जीवित रखने का मूल उपक्रम तो श्रमण संस्कृति की दो धाराओं के ऋषि मुनियों और आचार्यो ने किया। इस विधा को अक्षुण्ण बनाए रखने में जैन संतों की अग्रणी भूमिका मानी जा सकती है क्योंकि ऋषभदेव से महावीर और महावीर से लेकर आज तक जैन संतों की दिनचर्या का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है ध्यान योग, जिसे प्रत्येक जैन संत साधु साध्वी दिन में तीन बार नियमित रूप से करते हैं, जिसे सामयिक प्रतिक्रमण के नाम से जाना जाता है।

वही बौद्ध धर्म के अनुयाई इसे समय समय पर करते हैं, जिससे विपश्यना ध्यान के नाम से जाना जाता है। इसी प्रकार हिन्दू ऋषि-मुनियों के द्वारा भी समय समय पर समाधि के रूप में इसे जीवन्त रखा गया है। संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनि राज के परम प्रभावक शिष्य मुनिश्री प्रणाम सागर जी द्वारा भावना योग के माध्यम से ओर मुनि श्री प्रणम्य सागर जी द्वारा अर्हम योग के माध्यम से इस विधा को जन-जन के बीच रखा गया, जिससे लाखों लोग प्रभावित होकर लाभान्वित हुए हैं।

भारत सरकार द्वारा समय समय पर डाक टिकट सिक्कों को जारी करके जन जाग्रति का कार्य किया गया है। भारतीय डाक विभाग ने योगासन को लेकर कई डाक टिकट जारी किए हैं। भारतीय शिल्प की बात करें तो जैन तीर्थंकर प्रतिमा पद्मासन में मुद्रा में ध्यान अवस्था में वीतराग छवि के साथ हर गांव गांव शहर शहर में देखी जा सकती है। यह ध्यान योग की उत्कृष्ट अवस्था को प्रदर्शित करती है।

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