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अब हो हमारा एक ही लक्ष्य भारत बने भारत : हमारे सामाजिक और आध्यात्मिक जीवन में स्वतंत्रता के मायने


भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों ने भारत के जिस स्वरूप को दृष्टिगत रखकर लड़ाइयां लड़ी। क्या आज 78 वर्ष बाद भी उनके सपनों के भारत को हमने पाया है? शायद हां ! शायद ना ! भौतिक संसाधनों के विकास में निश्चित रूप से हमने प्रगति करने का भरसक प्रयास किया परन्तु सांस्कृतिक रूप से हमने गुलामी की चादर को ओर अच्छे से ओढ़ लिया है। पढ़िए ओम पाटोदी की विशेष रिपोर्ट…


इंदौर। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों ने भारत के जिस स्वरूप को दृष्टिगत रखकर लड़ाइयां लड़ी। क्या आज 78 वर्ष बाद भी उनके सपनों के भारत को हमने पाया है? शायद हां ! शायद ना ! भौतिक संसाधनों के विकास में निश्चित रूप से हमने प्रगति करने का भरसक प्रयास किया परन्तु सांस्कृतिक रूप से हमने गुलामी की चादर को ओर अच्छे से ओढ़ लिया है। गुलामी के वक्त तो हमारे पूर्वजों ने सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा फिर भी कर ली परंतु स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमने इस विचार को पूरी तरह गौण कर दिया और यही वजह है कि हमारा पुरातन भारत इस तथाकथित विकास कि दौड़ में कहीं गुम सा हो गया है।

भारत से इंडिया बने इस देश को पुनः भारत बनाना यह हमारे लिए एक चुनौती है। 21वीं सदी के महान चिंतक एवं दार्शनिक युगपुरुष संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने भारत को भारत बनाने के लिए एक सपना देखा था और उन्होंने अपने जीवन काल में प्रवचनों एवं प्रेरणा देकर इसे मूर्त रूप देने के लिए निरंतर प्रयास किया। आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनि राज का भौतिक शरीर भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं परन्तु उनका राष्ट्रवादी चिंतन हमारे साथ ज्यों का त्यों है। जो भारत को भारत बनाने के हमारे संकल्प की पूर्ति करेगा। जब भारत अपने पुरातन स्वरूप को प्राप्त करेगा और हमारे स्वतंत्रता के नायकों का स्वप्न भी पूरा हो सकेगा। आचार्य श्री ने कहा था कि यदि हमें अपनी प्राचीन सभ्यता और संस्कृति को प्रतिस्थापित करना है तो हमें अहिंसा और अनेकांत के सिध्दांतों के साथ बढ़ते हुए हमारी आध्यात्मिक चेतना को जगाना होगा।

हमें हमारी प्राचीन शिक्षा पद्धति को अपनाते हुए गुरुकुल शिक्षा एवं स्वतंत्रत नारी शिक्षा का लक्ष्य बनाकर शिक्षा में मातृभाषा को पूर्ण सम्मान के साथ अंगीकार करना होगा साथ ही हमारी क्षैत्रिय भाषा को संरक्षित करना होगा। स्वदेशी, स्वावलंबन, स्वदेशी चिकित्सा, हथकरघा जैसे आयामों के साथ अहिंसक जीवन शैली को अपनाते हुए गौरक्षा के जरिए प्राणी मात्र की रक्षा को बढ़ावा देने के साथ कत्ल खाना संस्कृति को विराम देना ही होगा। श्री राम की मर्यादा और कृष्ण का धर्म स्थापना के लिए प्रतिबद्धता के साथ बुद्ध का मानव धर्म व गुरु नानक की शिक्षाओं के साथ वर्धमान महावीर के सत्य, अहिंसा, अचोर्य, अपरिग्रह ओर ब्रह्मचर्य पंच सिध्दांतों को जन-जन की दिनचर्या का आधार बनाकर महात्मा गांधी की सुचिता स्वच्छता को अपनाकर जो परिदृश्य हमारे सामने उपस्थित होगा। वह असली भारत होगा तब जाकर इंडिया विलोपित हो सकेगा। समाज और सरकार ने इस ओर कदम तो बढ़ा दिया है परन्तु इस पर बगैर पूर्वाह्न के सबका साथ लेकर निरंतरता व प्रतिबद्धता के साथ लक्ष्य प्राप्त हो सकेगा।

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