मार्दव का अर्थ होता है मृदुता या नम्रता और उत्तम का मतलब है श्रेष्ठ या उत्कृष्ट। इस प्रकार, “उत्तम मार्दव धर्म” का मतलब है “श्रेष्ठ नम्रता का धर्म”। यह अवधारणा दर्शाती है कि नम्रता, विनम्रता और सहानुभूति जैसे गुण एक सच्चे धार्मिक जीवन का हिस्सा हैं। ये गुण व्यक्ति को अन्य लोगों के प्रति आदर और दया दिखाने में मदद करते हैं, और इस प्रकार समाज में एक सकारात्मक प्रभाव डालते हैं। पढ़िए बाल ब्रह्मचारी झिलमिल दीदी का विशेष आलेख
जब मान कषाय का क्षय हो जाया है तब मार्दव धर्म उत्पन्न होता है। जीवन में कभी मान नहीं करना चाहिए और ना ही मान से दूसरों को नीचा दिखाना चाहिए। कोमलता के परिणाम को मार्दव धर्म कहते हैं। परिणामों में वास्तविक कोमलता का अभिभाव सम्यकदर्शन के बिना नहीं होता। वस्तु स्वरूप के बोध बिना परस्पर संबंध बुद्धि, कर्तव्य बुद्धि, पर्याय बुद्धि आदि के अभिप्राय से भाव कठोर ही कहलाते हैं। जब मार्दव धर्म होता है तब अंतस से अर्हंत भगवन की भक्ति होती है और जिसको घमंड हो वो क्या अर्हंत भगवान की भक्ति करेगा क्या? भगवान की भक्ति तभी हो सकती है जब घमंड का मर्दन हो जाए। यदि भक्ति चाहते हों तो मान कषाय को बिलकुल निकाल दो। चक्रवर्तियों के भी इतनी बड़ी भारी विभूति थी। वो भी उनके साथ नहीं रही तो मैं तो उनके आगे क्या हूं। हम यहां थोड़ी सी संपत्ति पा लेने पर मान करते हैं और भगवान को देखो सबसे ज्यादा संपत्ति शांतिनाथ भगवान के पास थी पर उन्होंने मान नहीं किया।
क्या इसको उन्होंने आंख उठाकर भी नहीं देखा और यह सब छोड़ चल दिए अपनी आत्मध्यान लक्ष्मी के पास और हम लोगों के पास थोड़ा धन आ जाता है तो मान बहुत आ जाता है। ऊंचा पद मिले तो मान हो गया पर एक बात ध्यान रखना मान के बल से सब कुछ हासिल कर सकते हो पर सम्मान प्राप्त नहीं कर सकते। अगर सबका सम्मान गुरुओं का आशीर्वाद प्राप्त करना हो तो आपको मान कषाय छोड़नी होगी। मार्दव धर्म से इस लोक और परलोक दोनों के कार्य सिद्ध होते हैं। नम्र पुरुषों का हर एक व्यक्ति आदर करता है।
बड़े से बड़ा काम भी मृदुता से बन जाता है। इसके विपरीत मानी पुरुषों को हर जगह लज्जित ही होना पड़ता है। मृदु परिणामी पुरुष का आगामी भव भी सुधर जाता है। एक बार राजा अपने पलंग पर लेटा हुआ कविता बना रहा था। एक बड़ा विद्वान कवि पैसा तो मिलता नहीं इसलिए चोरी करने के इरादे से राजा के यहां चोरी करने गया। वह राजा के कमरे में घुस गया। राजा जाग रहा था। राजा की आवाज सुनकर वह राजा के पलंग के नीचे छुप गया। राजा लेटा-लेटा उस समय अपने वैभव का विचार कर करके अति प्रसन्न हो रहा था। उसके वर्णन स्वरूप कविता बना रहा था।
पहली पंक्ति
चेतोहरा यायवतय: सुहर्दो नुकुल: अर्थात मेरे पास ऐसी ऐसी रानियां हों, सदा मेरे मन को प्रसन्नित करती हैं
दूसरी पंक्ति उसने बनाई।
साद्रबंधवा: प्राक्तिगभीरश्च भृत्या अर्थात मेरे मंत्री ऐसे हैं जो मेरे अनुकूल हैं। जो मैं चाहता हूं अभी मेरा भला चाहते हैं।
तीसरी पंक्ति उसने बनाई
गाजिरंती दंतनिवाहस्तर लास्तु राडग अर्थात हाथियों शाला में मेरे बड़े-बड़े हाथी घोड़ा की शाला में घोड़े हिना हिना रहे हैं।
उससे चौथी पंक्ति नहीं बनी। नीचे बैठे-बैठे सुन रहा था उसको रहा नहीं गया और वह बोल पड़ा,
समिलने नयनयोनरही किचिरदस्ती अर्थात राजन आंख मिच जाने पर यह सब तेरे काम के नहीं है।
राजा उठा और बोला कौन है सामने आओ मेरे सामने आया और बोला राजन मैं एक ।हैं तुम मेरे मित्र हो। तुमसे मुझे ज्ञान मिला है क्या बोला तुमने ठीक कहा ।जब मनुष्य मर जाता है तब वह बाह्य पदार्थ यहीं छोड़कर चला जाता है। उस समय कोई भी क्षण भर के लिए साथ नहीं देता है। सब यही रखा रह जाता है। बादशाह जब इस दुनिया से गया तो खाली हाथ चला गया हमें किसी भी पदार्थ से मोह नहीं करना चाहिए कि किसी भी वस्तु का महान नहीं करना चाहिए अगर मन करना है तो हमें अपने सच्चे देव शास्त्र गुरु पर अपनी आत्मा पर अपने भगवान पर मान करना चाहिए कि हमें जैन कुल मिला है। देव शास्त्र गुरु का सानिध्य मिला है मां कषाय का त्याग कर देना और अपने जीवन में मार्दव धर्म को अपना लेना चाहिए यही हमारी सार्थकता है।













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