पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर जी महाराज ने प्रवचन में कहा कि अहंकार विष के समान है, जो आत्मा को भीतर से खोखला कर देता है, जबकि मार्दव धर्म अमृत स्वरूप है, जो जीवन को सुखी और सरल बनाता है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…
पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर जी महाराज ने प्रवचन में कहा कि अहंकार या मान मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा शत्रु है। यह विष के समान है, जो भीतर से आत्मा को खोखला कर देता है। मान से ग्रसित व्यक्ति चाहे कितना ही बड़ा पद, प्रतिष्ठा या वैभव क्यों न प्राप्त कर ले, उसके भीतर संतोष और शांति का अनुभव नहीं हो सकता। अभिमान ही कारण है कि परिवारों में कलह होता है, समाज में वैमनस्य पनपता है और व्यक्ति का जीवन दुःखमय बन जाता है।
महाराज श्री ने कहा कि जिस प्रकार विष का सेवन जीवन का अंत कर देता है, उसी प्रकार अहंकार का बोझ आत्मिक प्रगति को समाप्त कर देता है। इसके विपरीत, मार्दव धर्म अमृत स्वरूप है। विनम्रता को अपनाने वाला व्यक्ति सभी का प्रिय बन जाता है और उसका जीवन सहज, सरल और आनंदमय हो जाता है। मार्दव धर्म आत्मा की निर्मलता का प्रतीक है और यही धर्म साधना की वास्तविक नींव है।
मार्दव गुण को धारण करता है, वही समाज में आदर का पात्र बनता
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे वृक्ष पर फल लगने के बाद उसकी डालियाँ झुक जाती हैं, उसी प्रकार विद्या, गुण और धर्म से युक्त व्यक्ति भी सदैव विनम्र रहता है। जो अपने भीतर मार्दव गुण को धारण करता है, वही समाज में आदर का पात्र बनता है।
महाराज श्री ने समाजजनों से आह्वान किया कि वे दैनिक जीवन में छोटे-छोटे कार्यों में भी अहंकार का त्याग कर विनम्रता को अपनाएँ। चाहे परिवार में व्यवहार हो, कार्यक्षेत्र में संबंध हों या धर्मक्षेत्र में सेवा — हर जगह मार्दव धर्म का पालन जीवन को सुखी और सफल बना सकता है।
उन्होंने कहा कि अहंकार का त्याग कठिन अवश्य है, लेकिन निरंतर साधना, संयम और आत्मचिंतन से इसे पराजित किया जा सकता है। यदि हम मान रूपी विष से दूर रहकर मार्दव रूपी अमृत का सेवन करें, तो जीवन न केवल पवित्र बनेगा, बल्कि आत्मा के शाश्वत कल्याण का मार्ग भी प्रशस्त होगा।













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