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मंदिरों में दान ही धर्म नहीं, बीमारों, गरीबों की मदद भी धर्मः श्रुत संवेगी श्रमण मुनि श्री आदित्य सागर जी

  • जिन देशना को स्वीकार करना अज्ञानी के वश की बात नहींः मुनि श्री अप्रमित सागर जी

न्यूज़ सौजन्य- राजेश जैन ददू

इंदौर। श्रुत संवेगी श्रमण मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज ने कहा है कि जितनी चादर हो, उतना ही पैर फैलाओ अर्थात जितनी सामर्थ्य हो उतनी ही राशि की बोली लो। उससे अधिक की नहीं। 50 लाख रुपए की बोली लेकर 5 वर्ष में चुकाना ना तो धर्म है और ना ही दान है। दान तो पहले से अर्जित किए हुए धन से दिया जाता है, कमाकर देना दान नहीं है।
श्रुत संवेगी श्रमण मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज ने समोसरण मंदिर, कंचन बाग में प्रवचन देते हुए ये उद्गार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि मंदिर, मूर्ति, ग्रंथों का प्रकाशन ही दान नहीं है। भूखे को भोजन, प्यासे को पानी, बीमारों को चिकित्सा सहायता और गरीब बच्चों को शिक्षा में सहयोग देना दान भी है, धर्म भी है और बहुत बड़ा परोपकार है।
मुनि श्री अप्रमित सागर जी ने भी प्रवचन देते हुए कहा कि ज्ञानी जीव ही जिन देशना को स्वीकार कर सकता है। जिन देशना को पचाना और स्वीकार करना अज्ञानी और मिथ्या दृष्टि जीव के वश की बात नहीं। मीडिया प्रभारी राजेश जैन दद्दू ने बताया कि पर्यूषण पर्व 31 अगस्त से 9 सितंबर तक श्रुत साधना संस्कार शिविर मुनि श्री आदित्य सागर जी, मुनि श्री अप्रमित सागर जी एवं मुनि श्री सहज सागर जी महाराज के सान्निध्य में समोसरण मंदिर प्रवचन पांडाल कंचन बाग में लगाया जाएगा।

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