साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनिश्री निरंजन सागर महाराज ने कहा कि विपत्ति के समय भी अधीर नहीं होना चाहिए। जब सामने आई परिस्थिति का सामना करना तय है तो क्यों न धैर्य साहस से सामना किया जाये। पढ़िए संजय जैन हटा और राजेश रागी बकस्वाहा की यह रिपोर्ट…
हटा। विपत्ति के समय भी अधीर नहीं होना चाहिए। जब सामने आई परिस्थिति का सामना करना तय है तो क्यों न धैर्य साहस से सामना किया जाये। साइंस ऑफ लिविंग सत्र में आचार्य निरंजन सागर महाराज ने कहा कि ज्ञान ही दुःख का मूल है, ज्ञान ही भव का कूल है। राग सहित सो प्रतिकूल है, राग रहित सो अनुकूल है। चुन-चुन इनमें समुचित तू, मत चुन अनुचित भूल है। सब शास्त्रों का सार यही क्षमता बिन सब धूल है। सोचियेगा स्वयं आचार्य महाराज समता के लिए धैर्य के लिये शास्त्रों का सार कह रहे हैं। उन्होंने कहा कि अगर अपने जीवन में बड़े-बड़े ग्रन्थों को, वेदो को, पुराणों को पढ़ लिया, रट लिया पर आपके जीवन में समता नहीं आयी, शान्ति नहीं आयी, आपके जीवन में धैर्य का नामोनिशान तक नहीं तो ऐसा ज्ञान, मात्र भारभूत ही है। सहन वही कर सकता है, जिसने कषायों का दहन कर दिया है। इसका सीधा-सीधा अर्थ है कि आपकी सहनशीलता आपकी कषायहीनता को भी दर्शाती है। जिसने सहन करना सीख लिया, उसकी कर्म निर्जरा भी निश्चित है।
सहन करने वाला होता है महावीर
आचार्य श्री ने कहा, मार्गाच्यवन निर्जरार्थं परिषोढव्याः परीषहाः अर्थात् मार्ग से च्युतन होने के लिये और कमों की निर्जरा करने तो लिये जो सहन करने योग्य हो वो परीषह है। बिना अग्नि के ताप को सहन किये स्वर्ण में भी शुद्धता नहीं आती है। आज जितनी भी आत्मायें सिद्धालय में विराजमान हैं, उन्होंने भी अपनी सहनशीलता की परीक्षा दी है और उसका ही परिणाम है कि वे आज उस अनन्त सुख को भोग रहे हैं। भय से मनुष्य को तब तक डरना चाहिये जब तक वह नहीं आया है, परन्तु जब आ ही जाये तो निडर होकर उस का सामना करना चाहिये। कहते भी हैं कि मन के हारे हार और मन के जीते जीत, कषाय करने वाला अधीर होता है और सहन करने वाला महावीर होता है।













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