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आहार विहार के दौरान संतों की व्यवस्था बनाना समाज का कर्तव्य:विनय सागर: धर्म सभा में मुनि ने अपने उद्बोधन में जताई चिंता


जैन मुनि श्री विनय सागर जी ने साधु-संतों के विहार को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने समाज और कमेटियों से सहयोग और जागरूकता की अपील की है। पढ़िए अजय जैन की खबर…


अंबाह/मुरैना। जैन मुनि विनय सागर जी महाराज ने मुरैना स्थित जैन मंदिर में वर्तमान समय में धर्म के प्रति मंदिर कमेटी के पदाधिकारी एवं समाज की कम होती सक्रियता पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि साधु संत जब विहार करते हैं, तब उनके आहार-विहार के समय समाज और कमेटी के पदाधिकारी साथ में रहकर तथा चलकर उनका पूरा ध्यान रखें। ताकि उनकी रक्षा और सुरक्षा की जा सकें।

यह जागने का सही समय

उन्होंने कहा कि ये सोने का समय नहीं है, जागने का समय है, अगर अभी न जागे तो आगे हम कुछ नहीं कर पाएंगे। तमाम जैन संगठन को आगे आकर इस पर गहरा चिंतन करना चाहिए कि आखिर धर्म के प्रति हम अपने दायित्वों का निर्वहन क्यों नही कर पा रहे हैं? इस दौर में समाज की कम होती सक्रियता बहुत ही चिंता का विषय है।

कमेटियां निष्क्रिय हैं जो चिंताजनक

जैन संत ने कहा कि कमेटियां इतनी निष्क्रिय हो गई है कि संत को नगर प्रवेश के लिए श्रीफल भेंट करने के बाद भी उनकी अगवानी के लिए पदाधिकारी तक नहीं जाते हैं। जैन संत ने कहा जिस नगर में समाज की पर्याप्त संख्या हो उस नगर से आहार और विहार की व्यवस्था के लिए किसी का भी आगे न आना बहुत ही निराशाजनक स्थिति है।

हाईवे पर विहार चुनौती पूर्ण

संतश्री ने कहा कि अगर देखा जाए तो धौलपुर या ग्वालियर के रास्ते पर हाईवे के चलते सैकड़ों की संख्या में वाहनों का आवागमन होता है। ऐसी स्थिति में साधु संतों का विहार चुनौती पूर्ण है। अगर इस दौरान समाज के लोग साथ ना हो तो कोई भी दुर्घटना घटित हो सकती है। इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

आहार-विहार के लिए जागरूक हों

जैन मुनि ने कहा कि समाज को साधु संतों के आहार-विहार के लिए जागरूक होना होगा ताकि किसी अप्रिय घटना से बचा जा सके। साधु, संतों के विहार में अक्सर समाज की लापरवाही देखी जाती है जिसपर चिंतन जरूरी है। जब भी साधु का विहार हो संबंधित एरिया की जैन समाज का दायित्व बनता है कि वह स्थानीय पुलिस प्रशासन को भी उनके विहार कार्यक्रम की डिटेल दें। यदि पुलिस प्रशासन के संज्ञान में साधु का विहार होगा तो वह सुरक्षा के इंतजाम भी करेगी। साधु की सुरक्षा की जिम्मेदारी प्रशासन से कहीं अधिक समाज की है।

निर्णायक फैसले लेने होंगे

जब कोई अप्रिय घटना घट जाती है तो हम निंदा आदि प्रस्ताव पास करके बैठ जाते हैं अब समाज को  निर्णायक फैसले लेना होगा। हम अपनी विरासत बचाने को आगे आएं। इसकी रक्षा करने के लिए हमे संकल्पित होना होगा। मात्र व्हाट्सएप, फेसबुक पर ज्ञान बाटने की आदत से बाहर निकलकर कुछ सार्थक निर्णायक कदम उठाना आज की महती आवश्यकता है।

साधु संस्था की गरिमा बचाएं

साधु संस्था की गरिमा को बचाए रखना समाज की प्राथमिकता होनी चाहिए, क्योंकि दिगम्बर जैन धर्म की पहचान हमारे साधु संस्था से ही है।

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