खांदू कॉलोनी, बांसवाड़ा में बुजुर्गों के साथ बच्चों ने भी आकर भगवान, और गुरु की पूजन की। बाल गोपाल के साथ बड़ों के पूजन करने से बच्चों को धर्म के संस्कार का बीजारोपण होता है। यद्यपि भगवान साक्षात में नहीं होते हैं , किंतु प्रतिमा में भगवान के गुणों का आरोपण किया जाता है। आचार्य श्री वर्धमान सागर ने जिनवाणी श्रुत पंचमी के तीर्थंकर काल की देशना, गणधर स्वामी, अनुबंध केवली,श्रुत केवली, 11 अंगधारी, 10 पूर्व धारी मुनि, 5 अंग धारी मुनि, 4 आचरण धारी मुनि फिर अंग पूर्व एक देश धारी मुनियों पश्चात अह्यद मुनि, माघ नंदी मुनि धरसेनाचार्य तक के धार्मिक ऐतिहासिक इतिहास की देशना दी। पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट…
बांसवाड़ा। खांदू कॉलोनी बांसवाड़ा में बुजुर्गों के साथ बच्चों ने भी आकर भगवान, और गुरु की पूजन की। बाल गोपाल के साथ बड़ों के पूजन करने से बच्चों को धर्म के संस्कार का बीजारोपण होता है। यद्यपि भगवान साक्षात में नहीं होते हैं , किंतु प्रतिमा में भगवान के गुणों का आरोपण किया जाता है। गुरु साक्षात में होते हैं और गुरु ही वह माध्यम है भगवान तक पहुंचने का, क्योंकि गुरु भगवान का स्वरूप बताते हैं। और गुरु में भी यह गुण है। आप सभी की आत्मा में यह शक्ति विराजमान है आप भी भगवान बन सकते हैं। इसके लिए आपको ज्ञान और चारित्र का अवलंबन लेना होगा, इससे जीवन सुचारु चलता है।
स्कूल से भी बच्चों को ज्ञान मिलता है मगर वह लौकिक ज्ञान से आप अर्थ का उपार्जन कर सकते हैं, किंतु देव शास्त्र गुरु से धर्म की पाठशाला से जो ज्ञान प्राप्त होता है उससे आपका आध्यात्मिक कल्याण होता है। जिस प्रकार दूध में घी होता है, दूध से उसके विभिन्न स्वरूप को परिवर्तित कर दही बनाकर, दही को बिलोल कर ,अग्नि में तपाकर और घी प्राप्त किया जाता है। इसी प्रकार आप भी छोटे-छोटे व्रत, नियम, संयम, चारित्र को धारण कर मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं। यह मंगल देशना पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने बालक पूजन संस्कार कार्यक्रम की धर्म सभा में प्रगट की।
जिनवाणी बचाती है पाप से
ब्रह्मचारी गज्जू भैया एवं समाज अध्यक्ष सेठ अमृतलाल अनुसार आचार्य श्री ने आज जिनवाणी श्रुत पंचमी के तीर्थंकर काल की देशना, गणधर स्वामी, अनुबंध केवली,श्रुत केवली, 11 अंगधारी, 10 पूर्व धारी मुनि, 5 अंग धारी मुनि, 4 आचरण धारी मुनि फिर अंग पूर्व एक देश धारी मुनियों पश्चात अह्यद मुनि, माघ नंदी मुनि धरसेनाचार्य तक के धार्मिक ऐतिहासिक इतिहास की देशना दी। धरसेनाचार्य फिर उनके सुयोग्य शिष्य आचार्य श्री पुष्पदंत एवं आचार्य श्री भूतबली सागर ने षट्खंडागम ग्रंथ की रचना से परम उपकारी जिनवाणी श्रुत का अवतरण हुआ। वह दिन ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी का दिन श्रुत का जन्म होने से श्रुत पंचमी के रूप में जैन समाज द्वारा पूजन कर मनाया जाता है। जैन समाज द्वारा अनेक धार्मिक पर्व मनाए जाते हैं, किंतु जिनवाणी माता का एक मात्र पर्व श्रुत पंचमी ही है। राजेश पंचोंलिया, समाज प्रवक्ता अक्षय डांगरा अनुसार आचार्य श्री ने बताया कि जिस प्रकार माता हमारा लालन पालन वात्सल्य ममता संस्कार अच्छे बुरे का ज्ञान कराती हैं, उसी प्रकार हमारे शास्त्र, ग्रंथ, जिनवाणी हमें अध्यात्म का धार्मिक ज्ञान देकर पाप से बचाती हैं। इस कारण इन्हें जिनवाणी माता कहते हैं। वात्सल्य वारिधी आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने बताया कि वर्तमान में प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी के बहुत उपकार हैं। उनकी प्रेरणा से जिनवाणी माता को तांबे पर अंकित कराया गया। हमारे पूर्व आचार्यों के लिखित ग्रंथों की 6 माह तक विधर्मियों ने होली जलाई। आचार्य शांति सागर जी के समय मूलाचार ग्रंथ नहीं था। उन्होंने अपने आदर्श अनुकरणीय जीवन से साधुओं के लिए राह प्रशस्त की। आपने समाज को प्रेरणा दी सभी को जिनवाणी के स्वाध्याय से ज्ञान प्राप्त कर मनुष्य जीवन को सार्थक करने का पुरुषार्थ करना चाहिए। आर्यिका श्री महायश मति जी ने प्रश्न मंच किया।













Add Comment