दिगंबर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, हस्तिनापुर द्वारा प्रो. अनुपम जैन, इन्दौर की पहल पर 2021 में स्थापित महावीराचार्य पुरस्कार – 2025 पूना के प्रो. आर. एस. शाह को जैन गणित के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट अनुसंधान कार्य हेतु श्रुतपंचमी के पावन अवसर पर, पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के ससंघ पावन सान्निध्य में, 31 मई 2025 को अयोध्याजी में समर्पित किया गया। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…
अयोध्या। दिगंबर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, हस्तिनापुर द्वारा प्रो. अनुपम जैन, इन्दौर की पहल पर 2021 में स्थापित महावीराचार्य पुरस्कार – 2025 पूना के प्रो. आर. एस. शाह को जैन गणित के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट अनुसंधान कार्य हेतु श्रुतपंचमी के पावन अवसर पर, पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के ससंघ पावन सान्निध्य में, 31 मई 2025 को अयोध्याजी में समर्पित किया गया।
इस पुरस्कार के अंतर्गत ₹51,000 की सम्मान राशि, शाल, श्रीफल एवं प्रशस्ति-पत्र प्रदान किया गया। ज्ञातव्य है कि पूर्व में यह पुरस्कार निम्नलिखित विद्वानों को प्रदान किया जा चुका है:
2021: प्रो. आर. सी. गुप्त, झांसी – जैन गणित के क्षेत्र में मौलिक अनुसंधान हेतु
2022: प्रो. एस. सी. अग्रवाल, मेरठ – जैन गणित शोध के प्रोत्साहन हेतु
2023: प्रो. एस. के. बंडी, इंदौर – जैन ज्योतिर्विज्ञान के क्षेत्र में मौलिक अनुसंधान हेतु
2024: प्रो. पद्मावथम्मा, मैसूर – गणितसार संग्रह के कन्नड़ अनुवाद हेतु
कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. सविता जैन, शीतल तीर्थ–रतलाम द्वारा मंगलाचरण से हुई। स्वागत भाषण संस्थान के मंत्री श्री मनोज जैन (मेरठ) ने दिया। निर्णायक मंडल के विद्वान सदस्य प्रो. एस. सी. अग्रवाल (मेरठ) ने 2025 का पुरस्कार प्रो. आर. एस. शाह को प्रदान किए जाने की घोषणा की। इसके पश्चात डॉ. अनुपम जैन ने पूर्व वर्षों के पुरस्कार विजेताओं के कार्यों पर प्रकाश डाला।
घोषणा के पश्चात माननीय कुलगुरु प्रो. राकेश सिंघई (इंदौर), प्रो. जी. एस. मूर्ति (दिल्ली), प्रो. अभय कुमार जैन (लखनऊ), प्रो. विपिन जैन (मुरादाबाद), प्रो. अनुपम जैन तथा प्रायोजक परिवार द्वारा, पीठाधीश्वर श्री रवीन्द्रकीर्ति स्वामी जी के नेतृत्व में, प्रो. शाह को शाल, श्रीफल, प्रशस्ति-पत्र एवं सम्मान राशि भेंट कर सम्मानित किया गया।
प्रो. आर. एस. शाह का उद्बोधन:
अपने कृतज्ञता-भरे वक्तव्य में प्रो. शाह ने कहा:
“मेरी पहली मुलाकात डॉ. अनुपम जैन से 2009 में हुई थी। उन्होंने मुझे षट्खंडागम एवं कर्मसिद्धांत के गणितीय अध्ययन की प्रेरणा दी तथा ₹2 लाख की फैलोशिप भी दिलाई। मेरा अध्ययन आज भी प्रारंभिक स्तर पर है – मैंने अब तक केवल 1% कार्य ही किया है। जब मैंने इन 39 ग्रंथों के गणितीय अंशों का अध्ययन पूर्ण किया और पंचांग देखा, तो आश्चर्यजनक रूप से उस दिन भी श्रुतपंचमी ही थी – और आज भी वही दिन है।
मेरे पास षट्खंडागम के 5 खंडों पर धवला टीका (16), कषायप्रभृत पर जयधवला टीका (16), एवं महाबंध पर (07) टीकाएं – कुल 39 ग्रंथों के विस्तृत नोट्स सुरक्षित हैं, जिनका उपयोग शोध हेतु किया जा सकता है।
षट्खंडागम में ‘भंग समुत्कीर्तन’ नाम से संयोजन गणित (Combinatorics) का गहन विवेचन है। अक्षरों की संख्या 264 -1 की गणना भी आगमिक सूत्रों से की गई है।
मैं डॉ. अनुपम जैन एवं संस्थान का आभार प्रकट करता हूँ और विश्वास दिलाता हूँ कि जब तक जीवन है, जैन गणित का अध्ययन करता रहूँगा। मेरा अनुरोध है कि डॉ. अनुपम जी युवाओं को प्रोत्साहित करते रहें और उन्हें स्कॉलरशिप प्रदान करें, जिससे यह परंपरा आगे बढ़ सके।”
गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का संदेश:
“प्रो. शाह का वक्तव्य सुनकर अत्यंत प्रसन्नता हुई। वे 88 वर्ष की आयु में भी युवा ऊर्जा से भरपूर हैं। उन्होंने कर्मसिद्धांत का विशेष अध्ययन किया है। श्रावकों द्वारा षट्खंडागम का अध्ययन निषिद्ध नहीं है, बशर्ते वह विनयपूर्वक किया जाए।
अयोध्या की यह भूमि गणित सहित समस्त विद्याओं की जननी है। यहीं भगवान ऋषभदेव का जन्म हुआ, और यही भगवान भरत जी की भी जन्मभूमि है।”
अन्य वक्तव्य एवं बधाइयाँ:
आर्यिका श्री चन्दनामती माताजी: “गणित का स्थान जीवन में सर्वोपरि है। डॉ. अनुपम जैन ने स्वयं अथक परिश्रम किया है एवं अन्य शोधार्थियों को भी प्रेरित किया है। उन्होंने 15–20 शोधार्थियों को जैन गणित पर पीएच.डी. कराई है।”
मुख्य अतिथि प्रो. जी. एस. मूर्ति: “भारतीय ज्ञान परंपरा में वैदिक एवं श्रमण दोनों परंपराओं का समन्वय है। महावीराचार्य जैसे विद्वानों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है।”
कुलगुरु प्रो. राकेश सिंघई: “डॉ. अनुपम जैन द्वारा स्थापित यह पुरस्कार प्रेरणादायक है, परंतु उन्हें सम्मानित करने की भी आवश्यकता है।”
विशेष अतिथि प्रो. अभय कुमार जैन: “हमें केवल विचारक नहीं, प्रचारक चाहिए। डॉ. जैन का कार्य अत्यंत सराहनीय है।” कार्यक्रम का समापन अनुज जैन के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।













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