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मुरैना में महावीर निर्वाण लड्डू महोत्सव पर धर्मसभा में गूंजी अहिंसा की अमर वाणी : मुनिश्री विलोकसागरजी ने कहा— स्वयं को जीतना ही असली विजय है


मुरैना में भगवान महावीर स्वामी के मोक्ष कल्याणक महोत्सव पर मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने “जीवो और जीने दो” के सिद्धांत का संदेश देते हुए निर्वाण लड्डू समर्पण एवं भव्य धार्मिक कार्यक्रम का नेतृत्व किया। पढ़िए मनोज जैन नायक की रिपोर्ट…


मुरैना। भगवान महावीर स्वामी के मोक्ष कल्याणक महोत्सव पर निर्वाण लाडू दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित धर्मसभा में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने कहा कि भगवान महावीर ने “जीवो और जीने दो” के सिद्धांत का प्रचार करते हुए प्राणी मात्र को अहिंसा, करुणा और संयम का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि संसार के सभी जीवों को जीने का अधिकार है, इसलिए किसी भी जीव को कष्ट पहुँचाना या उसकी हत्या करना अधर्म है।

उन्होंने अपने प्रवचन में कहा कि स्वयं से लड़ो — बाहरी शत्रुओं से नहीं। क्रोध, मान, माया और लोभ को परास्त करने वाला व्यक्ति ही सच्चा विजेता होता है। क्रोध को क्षमा से, मान को मृदुता से, माया को सरलता से और लोभ को संतोष से जीतना चाहिए।

भगवान महावीर स्वामी मोक्ष कल्याणक महोत्सव पर पूज्य आचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के सान्निध्य में आयोजित भव्य समारोह में मोक्ष लक्ष्मी की कामना के साथ निर्वाण लाडू समर्पित किया गया। निर्वाण कांड वाचन के अंत में प्रथम निर्वाण लाडू समर्पित करने का सौभाग्य प्रेमचंद पंकज जैन, बंदना साड़ी सहित 23 अन्य श्रद्धालुओं को प्राप्त हुआ। तत्पश्चात सभी उपस्थित श्रावकों ने निर्वाण लाडू अर्पित किए।

प्रातःकालीन बेला में भगवान महावीर स्वामी का अभिषेक, शांतिधारा एवं अष्टद्रव्य से संगीतमय पूजन सम्पन्न हुआ। अरिहंत म्यूजिकल ग्रुप मुरैना द्वारा प्रस्तुत भजनों ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। कार्यक्रम के समापन पर पुण्यार्जक परिवारों को चातुर्मास कलश वितरित किए गए।

इसे ज्ञानोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है

जैन धर्मावलंबी दीपावली का त्यौहार भगवान महावीर के निर्वाण दिवस के रूप में मनाते हैं। कार्तिक कृष्ण अमावस्या के इस पावन दिन महावीर स्वामी ने जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति पाकर मोक्ष प्राप्त किया था। इसी दिन उनके प्रथम शिष्य गौतम गणधर को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई थी, इसलिए इसे ज्ञानोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। जैन समाज इस दिन को गहन श्रद्धा और संयमपूर्वक मनाता है।

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