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मुनिश्री अनुत्तरसागरजी का 1008 जिन सहस्त्रनाम व्रत का महापारणा 24 को: उपवास की साधना के लिए जैन मुनि का नाम गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में


पट्टाचार्यश्री विशुद्धसागरजी मुनिराज के शिष्य डॉ.मुनिश्री अनुत्तरसागरजी के जिन सहस्त्रनाम व्रत के 1008 उपवास का महापारणा 24 जनवरी को राजिम जिला रायपुर छत्तीसगढ में होगा। राजिम से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटील की यह खबर…


राजिम (रायपुर छग)। पट्टाचार्यश्री विशुद्धसागरजी मुनिराज के शिष्य डॉ.मुनिश्री अनुत्तरसागरजी के जिन सहस्त्रनाम व्रत के 1008 उपवास का महापारणा 24 जनवरी को राजिम जिला रायपुर छत्तीसगढ में होगा। डॉ. मुनिश्री अनुत्तरसागरजी के भक्त जयसिंगपुर निवासी वर्धन पाटील ने आग्रह किया कि कृपया अधिक से अधिक संख्या में पहुंचकर इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बनिए। उपवास की साधना के लिए मुनिश्री अनुत्तर सागर जी महाराज का नाम गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज किया जा चुका है। आचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज के शिष्य मुनिश्री अनुत्तर सागर जी की चर्चा पूरे विश्व में हो रही है। उपवास की साधना के लिए जैन मुनि का नाम गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज हो चुका है। मुनिश्री अनुत्तर सागर जी महाराज को छोटी उम्र में ही वैराग्य हो गया था। उन्होंने 12 साल में अभी तक 1850 उपवास किए हैं। उनके उपवास में खाने की तो बात ही दूर, पूरे 24 घंटे में एक बूंद पानी भी नहीं लिया जाता। मुनिश्री ने वर्ष 2023 में 256 से अधिक उपवास किए हैं।

मुनिश्री का परिचय 

मुनि श्री अनुत्तर सागर जी का जन्म नाम जितेंद्र जैन। माता लक्ष्मीदेवी जैन और पिता जमुना प्रसाद जैन। जन्म भोपाल( मध्य प्रदेश)। जन्म दिनांक 6 अगस्त 1977। लौकिक शिक्षा हायर सेकेंडरी। दीक्षा पश्चात नाम मुनि श्री अनुत्तर सागर जी महाराज। ब्रह्मचर्य व्रत 26 नवंबर 2004। ब्रह्मचर्य व्रत गुरु आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज। ब्रह्मचर्य व्रत स्थल भोपाल( मध्य प्रदेश)।

मुनि दीक्षा

मुनि दीक्षा 8 नवंबर 2011। मुनि दीक्षा स्थान मंगलगिरी जिला सागर (मध्यप्रदेश)। मुनि दीक्षा गुरु आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज। मुनि श्री अनुत्तर सागर जी 1011 दिन की मौन तपस्या भी कर चुके हैं तथा 9 राज्यों में 30 हजार किमी की पदयात्रा भी की है। आप प्रथमानुयोग के ज्ञाता हैं। आप चारित्रशुद्धि व्रत के 1234 उपवास पूर्ण कर चुके हैं। आपने सहस्त्रनाम के 428 उपवास भी पूर्ण किए हैं। आपने आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज के साथ अभी तक 100 से अधिक पंचकल्याणकों में अपना सान्निध्य प्रदान किया है। इस पंचमकाल में चतुर्थ काल जैसी साधना में लीन दिगंबर जैन मुनिश्री अनुत्तर सागर जी हैं।

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