जैन समाज के अतिशय क्षेत्र सिहोनिया जी में विश्व शांति जन कल्याण के हितार्थ मुनि श्री शिवानंद जी एवं मुनि श्री प्रशमा नंदी जी महाराज के सानिध्य में 11वीं शताब्दी की 21 फुट ऊंची भगवान शांतिनाथ की अद्भुत प्रतिमा का महामस्तकाभिषेक प्रतिष्ठाचार्य पं. संजय शास्त्री के मार्गदर्शन में संपन्न हुआ। इस अवसर पर मुनिश्री शिवानंद जी महाराज ने कहा कि तीर्थंकर भगवान का अभिषेक तो हम सभी प्रतिदिन जिनालय में देखकर अपने पुण्य का विस्तार करते हैं। पढ़िए अजय जैन की रिपोर्ट…
अम्बाह। जैन समाज के अतिशय क्षेत्र सिहोनिया जी में विश्व शांति जन कल्याण के हितार्थ मुनि श्री शिवानंद जी एवं मुनि श्री प्रशमा नंदी जी महाराज के सानिध्य में 11वीं शताब्दी की 21 फुट ऊंची भगवान शांतिनाथ की अद्भुत प्रतिमा का महामस्तकाभिषेक प्रतिष्ठाचार्य पं. संजय शास्त्री के मार्गदर्शन में संपन्न हुआ। इस अवसर पर मुनिश्री शिवानंद जी महाराज ने कहा कि तीर्थंकर भगवान का अभिषेक तो हम सभी प्रतिदिन जिनालय में देखकर अपने पुण्य का विस्तार करते हैं, लेकिन महामस्तकाभिषेक देखना और करना बड़े भाग्य से मिलता है। उन्होंने कहा कि भगवान शांतिनाथ एक नहीं, बल्कि तीन पद के धारी थे।
वे चक्रवर्ती, कामदेव एवं तीर्थंकर थे। जब व्यक्ति का पुण्य जाग्रत होता है, तब चक्रवर्ती और वैभवशाली बनता है। भक्ति बढ़ती है तो कामदेव बन जाता है और अंतरंग में धर्म और भक्ति का पूर्ण जागरण होने पर कर्मों का क्षय करते हुए तीर्थंकर बन जाता है। उन्होंने कहा कि भगवान शांतिनाथ जब चक्रवर्ती अवस्था में थे, तब 32 हजार मुकुटधारी राजाओं ने उनके आगे समर्पण कर दिया था। मुनिश्री ने कहा कि विरासत में हमें क्या मिला, यह महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि हम इस संसार को क्या देकर जाएँगे इस मौके पर जिनेश जैन ने कहा कि जैन तीर्थ हमारे देश की संस्कृति के माथे के तिलक होते हैं।
प्राचीन तीर्थ देश की धरोहर है जिनकी कीमत तो केवल श्रद्धालुओं द्वारा तीर्थ वंदना की जाने वाले अनन्तानंत श्रद्धाभक्ति के भावों से पहचानी जा सकती है। अंतरंग भावों से की गई भक्ति आध्यत्मिक और ध्यान के रंगों से सराबोर कर देती है। इस मौके पर मंत्रोच्चारण के साथ इंद्रों ने कलशों में शुद्धजल भरकर भगवान का जयकारों के साथ अभिषेक किया।













Add Comment