आचार्य श्री प्रमुख सागर महाराज अपने चातुर्मासिक प्रवास के दौरान श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि हम किसी से ईर्ष्या करते हैं, किसी का बुरा सोचते हैं, तो हमें पाप का बंध अवश्य होगा। जीवन में धर्म ध्यान युवावस्था में ही संभव है। बुढ़ापे में तो लोग शरीर और रोग से ग्रसित होते हैं और जीवन में इतना पाप संचित कर लेते हैं कि उनसे धर्म होता ही नहीं है। पढ़िए सुनील कुमार सेठी की रिपोर्ट…
गुवाहाटी। स्थानीय फैंसी बाजार स्थित भगवान महावीर धर्मस्थल में उपस्थित आचार्य श्री प्रमुख सागर महाराज अपने चातुर्मासिक प्रवास के दौरान श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि हम किसी से ईर्ष्या करते हैं, किसी का बुरा सोचते हैं, तो हमें पाप का बंध अवश्य होगा। जीवन में धर्म ध्यान युवावस्था में ही संभव है। बुढ़ापे में तो लोग शरीर और रोग से ग्रसित होते हैं और जीवन में इतना पाप संचित कर लेते हैं कि उनसे धर्म होता ही नहीं है।

रोगी और भोगी जीवों की दशा बुढ़ापे में ऐसी होती है कि उन्हें धर्म आदि नहीं सुहाता है। उन्हें तो अपने परिवार की चिंता सताती है। आचार्य श्री ने कहा कि हम बिना कर्म किए रह नहीं सकते हैं, हर कर्म का प्रतिफल भी हमें ही भोगना पड़ता है। इसी तरह हमें अच्छे आचरण पर आध्यात्मिक जीवन में गुरुकृपा या परमात्मा की अनुकंपा प्राप्त होती रहती है।
मनुष्य भाग्य को कर्म के माध्यम से बदल भी सकता है। जप, तप आदि व कर्म है, जिनके माध्यम से भाग्य भी बदला जा सकता है। आचार्य श्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि हाड़ जले ज्युं लकड़ी, केस जले ज्युं घास। कंचन जैसी काया जल गई, कोई ना आया पास। इसीलिए बंधुओं ऐसा कर्म करो कि मरने के बाद लोग तुम्हारे धन के कारण नहीं, कर्म के कारण नाम लें।

इससे पूर्व गुरुवार को श्रीजी की शांतिधारा करने का सौभाग्य कैलाश चंद्र – प्रकाश चंद काला परिवार रंगिया/ गुवाहाटी/ दिल्ली को प्राप्त हुआ। यह जानकारी समाज के प्रचार-प्रसार विभाग के मुख्य संयोजक ओमप्रकाश सेठी एवं सहसंयोजक सुनील कुमार सेठी ने दी।













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