गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने अयोध्या में अपने प्रवचन में कहा कि भगवान ऋषभदेव सिंहासन पर सुख से बैठे हुए थे कि उन्होंने अपना चित्त कला और विद्याओं के उपदेश में लगाया। उसी समय उनकी ब्राह्मी और सुंदरी दोनों पुत्रियां मांगलिक वेशभूषा धारणकर पिता के पास पहुंची और विनय से भगवान को प्रणाम किया। अयोध्या से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटील की खबर…
अयोध्या(उप्र)। गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने अयोध्या में अपने प्रवचन में कहा कि भगवान ऋषभदेव सिंहासन पर सुख से बैठे हुए थे कि उन्होंने अपना चित्त कला और विद्याओं के उपदेश में लगाया। उसी समय उनकी ब्राह्मी और सुंदरी दोनों पुत्रियां मांगलिक वेशभूषा धारणकर पिता के पास पहुंची और विनय से भगवान को प्रणाम किया। भगवान ने भी उन दोनों कन्याओं को आशीर्वाद देकर बड़े प्रेम से उन्हें अपनी गोद में बिठा लिया। उनके मस्तक पर हाथ फेरा और पुत्रियों के साथ कुछ विनोद करने लगे, अनंतर बोले-हे पुत्रियों! तुम दोनों विद्या ग्रहण करने में प्रयत्न करो क्योंकि, विद्या ग्रहण करने का यही काल है। ऐसा कहकर बराबर उन्हें आशीर्वाद देकर भगवान ने अपने चित्त में स्थित श्रुतदेवता को आदर पूर्वक सुवर्ण के विस्तृत पट्टे पर स्थापित किया, फिर भगवान ने ‘सिद्धं नमः’ मंगलाचरण पूर्वक अपने दाहिने हाथ से ‘अ आ’ आदि वर्णमाला लिखकर ब्राह्मी को शुद्ध अक्षरावली लिखने का उपदेश दिया। जिसका नाम सिद्ध मातृ का है, जो स्वर व्यंजन के भेद से दो भेद रूप हैं और समस्त विद्याओं में पाई जाती है तथा भगवान ने अपने बायें हाथ से ‘इकाई दहाई’ आदि संख्या को लिखते हुए सुंदरी को अंकगणित लिखने का उपदेश दिया। वांग्मय के बिना न कोई शास्त्र है और न कोई कला है, इसलिए भगवान ने सबसे पहले उन पुत्रियों को वाङ्गय का उपदेश दिया था। व्याकरणशास्त्र, छंदशास्त्र और अलंकारशास्त्र इन तीनों के समूह को वांग्मय कहते हैं। भगवान द्वारा बनाया गया व्याकरणशास्त्र बहुत विस्तृत था। जिसमें सौ से अधिक अध्याय थे। भगवान ने सबसे प्रथम ब्राह्मी कन्या को वर्णमालाएं पढ़ाई थीं। यही कारण है कि आज भी इसे ब्राह्मी लिपि कहते हैं। पिता के अनुग्रह से ये दोनों कन्याएं समस्त विद्याओं को पढ़कर सरस्वती देवी के अवतार लेने के लिए पात्रता को प्राप्त हो गई थीं।













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