भारतीय संस्कृति में जैन धर्म अनादि निधन धर्म है , जैन धर्म में चौबीस तीर्थंकर होते हैं, भूतकाल में चौबीस तीर्थंकर हुए वर्तमान में है , भविष्य में होंगे। वर्तमान चौबीसी में प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव हुए हैं। जयपुर से पढ़िए, उदयभान जैन का यह आलेख…
जयपुर। भारतीय संस्कृति में जैन धर्म अनादि निधन धर्म है , जैन धर्म में चौबीस तीर्थंकर होते हैं, भूतकाल में चौबीस तीर्थंकर हुए वर्तमान में है , भविष्य में होंगे। वर्तमान चौबीसी में प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव हुए हैं।भगवान ऋषभदेव जैन पुराणो़ के अनुसार 14 कुलकरों में माता रानी मरुदेवी व महाराजा नाभिराय अंतिम कुलकर थे, शाश्वत जन्मभूमि अयोध्या में महाराजा नाभिराय मरु देवी के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का जन्म हुआ । भगवान ने ऋषभदेव देव का जन्म इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रिय परिवार में हुआ , भगवान ऋषभदेव को वृषभदेव, आदिनाथ , ऋषभदेव , पुरुदेव कहते है। विश्व में प्राचीनतम लिपिबद्ध धर्म ग्रन्थों में से एक ऋग्वेद आदि ग्रंथों में भगवान ऋषभदेव के उल्लेख तथा विश्व की समस्त संस्कृतियों में ऋषभदेव की किसी ने किसी रूप में उपस्थित जैन धर्म की प्राचीनता और भगवान ऋषभदेव की सर्व मान्य शक्ति की स्थिति को व्यक्त करती है। भगवान ऋषभदेव बाल क्रियाओं से धीरे-धीरे बड़े होने लगे उनकी यश कीर्ति बढ़ने लगी ,भगवान ऋषभदेव का विवाह नन्दा और सुनन्दा से हुआ। उनके 101पुत्र और 2 पुत्रियां हुईं।
प्रजा जन को 6 विद्याओं का उपदेश दिया
भरत चक्रवर्ती सबसे बड़े पुत्र थे उनके नाम से भारत का नाम पड़ा , दूसरे पुत्र भगवान बाहुबली थे जो महान राजा एवं कामदेव पद के धारक थे। दो पुत्रियां थीं एक ब्राम्ही और दूसरी सुंदरी ,इन पुत्रियों को ऋषभदेव ने युग के प्रारंभ में लिपि विद्या यानी के अक्षर विद्या ( अक्षर विद्या) और दूसरी को अंक विद्या का ज्ञान दिया। महाराज ऋषभदेव का सुशासन चल रहा था। अचानक उस समय कल्प वृक्षों की समाप्ति से उदर पूर्ति की विकट समस्या होने लगी। जनता में त्राहि त्राहि होने लगी प्रजा चिंतित होने लगी। सभी जनता भगवान ऋषभदेव के दरबार में आए और महाराजा से निवेदन किया कि भगवन अब कल्प वृक्षों का प्रभाव कम हो रहा है, अब हम सब की उदर पूर्ति कैसे होगी ? हम अपना जीवन कैसे व्यतीत करेंगे? हे देव रक्षा करो रक्षा करो। हमें उचित मार्गदर्शन प्रदान करो, ये तब भगवान ऋषभदेव ने अपने वैराग्य भाव से प्रेरित होकर दीक्षा से पूर्व प्रजा जन को 6 विद्याओं का उपदेश दिया। जिनमें असि, मसि, कृषि ,विद्या , वाणिज्य एवं शिल्प कला आदि।
असि:- भगवान ऋषभदेवने भारतीय संस्कृति के संरक्षण तथा राजधर्म के पालन हेतु शस्त्र विद्या एवं युद्ध नीति बताई,।
मसि:- मसि की शिक्षा अपनी पुत्री ब्राम्ही एवं सुन्दरी के माध्यम से जनता को दी ,यानी लिपि विद्या और अंक विद्या, आज लिपि ब्राह्मी लिपि मानी जाती है । सुंदरी को दी गई अंक विद्या समस्त गणितीय विकास का मूलाधारहै।
कृषि:- भगवान ऋषभदेव ने प्रजा को सर्वप्रथम शाकाहार का प्रवर्तन करते हुए स्वयं इक्षुदण्डों के ₹ पैदा करने व उनके विभिन्न उपयोगों की विधि बताई। कृषि कार्य का विधिवत पैदा करने के उपाय बताये , धान्य कैसे पैदा होती है, उदर पूर्ति के साथ-साथ अनेकों गतिविधियों व व्यवसाय बढ़ने लगे।
विद्या :- भगवान ने असि, मसि, कृषि के बाद विद्याओं का ज्ञान कराया, जिसमें अंक विद्या और लिपि विद्या का ज्ञान देकर भारतीय संस्कृति का विशेष योगदान दिया ।
वाणिज्य:- भगवान ने जीवन यापन के लिए वाणिज्य कला सिखाई जो आज प्रमुख रूप से ले चुकी है। प्रजाजन को बताया कि आप द्वारा की गई कृषि व अन्य उत्पादों क व्यापार कैसे किया जाए? कैसे क्रय-विक्रय किया जाए , यानि वाणिज्य कला के बारे में बताया ,।
शिल्प कला:- भगवान ने शिल्प कला का ज्ञान दिया, उन्होंने बताया कि जीवन जीने के लिए मकान की आवश्यकता है, व्यापार के लिए गोदाम व ऑफिस आदि की आवश्यकता है ,उन्होंने देव दर्शन के लिए मंदिर आदि कैसे तैयार हों, सभी शिल्प कलाओं की विद्यायें बतायीं।
समाज को विकास का मार्ग बताया
इस प्रकार भगवान ऋषभदेव ने जीवकोपार्जन के साधन बताये जो आज तक चल रहे हैं। भगवान ऋषभदेव ने भारतीय संस्कृति को 6 कार्यों द्वारा जहां समाज को विकास का मार्ग बताया। वहीं अहिंसा, संयम, तथा तप के उपदेशों द्वारा समाज की आन्तरिक व चेतनाओं को भी जगाया। भारतीय संस्कृति का जो योगदान भगवान ऋषभदेव ने दिया। उसकी चर्चायें प्राचीनतम ग्रन्थों में मिलती है। इस प्रकार भगवान ने अपनी प्रतिष्ठित राज सत्ता, संपूर्ण वैभव एवं परिवार का त्याग कर आत्म साधना हेतु मुनि दीक्षा ली और घोर साधना,तपस्चर्या करके इस युग के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव मोक्षगामी बने।
भारतीय संस्कृति के आद्य प्रणेता भगवान ऋषभदेव हैं
ऐसे जगत पूज्य भगवान ऋषभदेव के जीवन, उनके व्यक्तित्व तथा मानवता का दिए गएअवदान को विश्व समुदाय के सम्मुख सही रूप से प्रस्तुत करने के लिए और यह स्पष्ट करने हेतु कि भारतीय संस्कृति के आद्य प्रणेता भगवान ऋषभदेव हैं। आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज, समाधिस्थ आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज, आचार्य श्री सन्मति सागर जी महाराज, गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा और आशीर्वाद से भगवान ऋषभदेव के जीवन, अहिंसा सिद्धांतों और 6 जीवन यापन की विद्याओं को जन जन तक पहुंचाने में अहम् भूमिका निभाई। गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माता जी की प्रेरणा व आशीर्वाद से, स्वस्ति श्री रवीन्द्र कीर्ति स्वामी जी के मार्गदर्शन में अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन युवा परिषद् देश के युवाओं की सर्वोच्च संस्था के माध्यम से व देश की विभिन्न संस्थाओं के द्वारा भगवान ऋषभदेव का जन्म कल्याणक व मोक्ष कल्याणक को संपूर्ण देश व विदेश की जैन समाज मनाती है ।
‘स्टैच्यू ऑफ अहिंसा’ का नाम दिया
गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने भगवान ऋषभदेव की दीक्षा तपो स्थली इलाहाबाद का विकास करवाया। वहीं मांगीतुंगी में 108 फीट ऊंची प्रतिमा जी का निर्माण करवा कर ‘स्टैच्यू ऑफ अहिंसा’ का नाम दिया जो जन जन द्वारा पूजी जाती है, जो देखता है वो हर्षित हो कर भक्ति में भाव विभोर हो जाता है और गुरु मां के इस अदभुत कार्य की भूरि भूरि प्रशंसा करते हैं। वहीं आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने कुंडलपुर बड़े बाबा भगवान ऋषभदेव आदिनाथ जी का बडा मंदिर बनवाकर दर्शन कराएं।
क्षेत्र में धार्मिक सामाजिक कार्यक्रम करेंगे
भगवान ऋषभदेव की शिक्षाओं को जन-जन तक पहुंचना चाहिए । उनका जन्म कल्याणक चैत्र बदी नवमी के दिन इस वर्ष आने वाली 12 मार्च को है , संपूर्ण जैन समाज की संस्थायें सभी अपने अपने जैन मन्दिरों में युवा परिषद्, युवा मंडल, महिला मंडल सभी संस्थाएं मिलकर अपने-अपने क्षेत्र में धार्मिक व सामाजिक कार्यक्रम करेंगे। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों से निवेदन है कि 12 मार्च को यानि चैत्र बदी नवमी का अवकाश घोषित हो और इस दिवस पर राष्ट्रीय स्तर पर आयोजन हों। तभी हमारी सभी की जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भारतीय संस्कृति के आद्य प्रणेता भगवान ऋषभदेव के उपकारों की सच्ची भक्ति है।













Add Comment