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अतिशयकारी मंदिरों में लगता है श्रद्धालुओं का मेलाः 26 दिसंबर को मनाई जाएगी भगवान पार्श्वनाथ जी की जन्म जयंती


भगवान पार्श्वनाथ जी की जन्म जयंती के अवसर पर देशभर में अतिशय और सिद्ध क्षेत्र में पौष कृष्ण एकादशी को धार्मिक आयोजन होंगे। पंचकल्याण से लेकर महामस्तिकाभिषेक और शांतिधारा के लिए श्रद्धालु जन जुटेंगे। भगवान पार्श्वनाथ के कुछ चुनिंदा और चर्चित अतिशयकारी मंदिरों की खबर पढ़िए श्रीफल जैन न्यूज पर…


इंदौर। भगवान पार्श्वनाथ की बुधवार को जन्म जयंती है। भगवान पार्श्वनाथ का जन्म पौष कृष्ण एकादशी को वाराणसी में हुआ था। भगवान पार्श्वनाथ की जयंती देश-विदेश में समूचा जैन समाज पूरी भक्ति भाव से मनाता है। यूं तो देश में भगवान पार्श्वनाथ के असंख्य मंदिर हैं, जो अतिशय क्षेत्र के रूप में पूजनीय और आस्था के केंद्र हैं। हम आज भगवान पार्श्वनाथ के देश के चुनिंदा अतिशय क्षेत्र स्थित मंदिरों का जिक्र करने जा रहे हैं। आइए जानते हैं यह मंदिर कहां हैं, किस राज्य में हैं और इनकी किस प्रसिद्धि के कारण जैन श्रद्धालुजन यहां वर्ष पर्यन्त जाते हैं।

दर्शन मात्र से होती है मनोकामना पूरी

उत्तरप्रदेश के अतिशय क्षेत्र में जलालाबाद एकमात्र ऐसा क्षेत्र है। जहां भगवान पार्श्वनाथ की लघु पाषाण प्रतिमा मौजूद है। भगवान पार्श्वनाथ की यह प्राचीन प्रतिमा है। तथ्यों के अनुसार काफी पुरानी है। चमत्कारिक प्रतिमा के दर्शन मात्र से श्रद्धालुओं की मनोकामना पूरी हो जाती है। इसी अतिशय के चलते यहां वर्षपर्यन्त श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।

विघ्नहरण पार्श्वनाथ अतिशय क्षेत्र में 9वीं सदी की प्रतिमा

श्री 1008 विघ्नहरण पार्श्वनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र कुलचारम आंध्रप्रदेश में वर्ष 1984 में भू-गर्भ से भगवान पार्श्वनाथ की काले पाषाण की सप्त फण वाली 11 फीट 3 इंच की प्रतिमा मिली है। यह अलौकिक देव रक्षित प्रतिमा 9वीं शताब्दी ई. की है। यह भी अतिशय तीर्थ के रूप में विख्यात है। इसका उल्लेख आंध्रप्रदेश शासन में पुरातत्व निदेशक रहे डॉ. जी.जवाहरलाल ने अपनी अंग्रेजी पुस्तक ‘जैन सेंटर इन आंध्रप्रदेश’एवं ‘जैन मान्यूमेंट इन आंध्रप्रदेश’ में किया है।

बीजापुर में विराजित है सहस्त्र फणी प्रतिमा

कर्नाटक राज्य के बीजापुर में भगवान पार्श्वनाथ की सातिशय प्रतिमा लगभग 1500 साल पुरानी है। 1008 सर्पफणों से सुशोभित होने के कारण यह प्रतिमा सहस्रफणी कहलाती हैं। हर फण भीतर से जुड़ा होने के कारण अभिषेक का जल या दूध हर फण से उतरते हुए मूर्ति को अभिषिक्त करता है। यहां पर भी आने वाले श्रद्धालुओं की मनोपूर्ति होती है। यहां पर भी सालभर तक श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है।

यहां है भगवान की आदम कद प्रतिमा

मप्र के रतलाम जिले में नागेश्वर पार्श्वनाथ तीर्थ भी अतिषय तीर्थ के रूप में जगत विख्यात है। यहां पर जैन समुदाय का एक प्रसिद्ध तीर्थस्थल है। यहां हम 23वें तीर्थंकर भगवान श्री पार्श्वनाथ की आदमकद प्रतिमा है। यह राज्य के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में जैन समुदाय के पवित्र स्थानों में लोकप्रिय है। इसके महत्व के कारण इसे महातीर्थ कहा गया है। माना जाता है कि यह प्रतिमा मर्कट मणि नामक कीमती पत्थर से बनी है। इस मंदिर के बारे में यह भी वर्णित है कि भगवान पार्ष्वनाथ की प्रतिमा बहुत पुरानी है।यहां नियमित रूप से भक्त आते हैं और दैनिक पूजा-अर्चना करते हैं।

दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र, अंकलेश्वर

गुजरात राज्य के सूरत और बड़ौदा के बीच अंकलेश्वर रेलवे स्टेशन है। वहां से अंकलेश्वर गांव करीब एक किमी दूरी पर है । यहां भोयरे से भगवान पार्श्वनाथ की अतिशयकारी मूर्ति प्राप्त हुई, जो चिंतामणि पार्श्वनाथ के नाम से विख्यात है। यह अतिशय है कि इस मूर्ति के दर्शन करने मात्र से ही चिंताएं दूर हो जाती हैं। यहां जैन और जैनेत्तर बंधु भारी संख्या में मनौती मानते हैं ।

श्री दिगंबर जैन देवपुरी अतिशय क्षेत्र

खेडब्रह्मा तहसील से पूर्व दिशा में 6 किमी की दूरी पर देरोल गांव है, जो पूर्व में ‘देवनगरी’ या ‘देवपुरी’ के नाम से विख्यात है। यहां वर्तमान में तीन जिनालय हैं। चौथी शताब्दी की प्राचीन, कलात्मक भगवान श्री 1008 आदिनाथ की अतिशयकारी प्रतिमा मंदिर क्रमांक एक में विराजित है एवं दूसरे जिनालय में भगवान श्री 1008 पार्श्वनाथ की अतिशयकारी मनोकामनापूर्ण करने वाली प्रतिमा है। इन दोनों मंदिरों में सभी मूर्तियां दिगंबर आम्नाय की हैं। यहां मंदिर बावन जिनालय कोठरिया पर संवत् 1115 से 1135 लिखा हुआ है।

महुवा पार्श्वनाथ हजार साल पुराना मंदिर

विघ्नहर पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर क्षेत्र का पुराना नाम मधुपुरी था। यहां 1 हजार वर्ष पुराना मंदिर है। लकड़ी के खंबों के लेख से पता चलता है कि यहां भट्टारक की गद्दी थी। यह क्षेत्र समतल भूमि पर नदी के किनारे स्थित है। यहां के मूलनायक भगवान विघ्नहर पार्श्वनाथ की मूर्ति रेत से निर्मित है और अतिशयकारी है। मूर्ति के प्रति लोगों की अगाध श्रद्धा है। जैन एवं जैनेतर श्रद्धालुओं का निरन्तर आना-जाना लगा रहता है। यहां दर्शन करने से विघ्न दूर हो जाते हैं।

अतिशय क्षेत्र पुण्योदय तीर्थ

पार्श्वनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र पुण्योदय तीर्थ  में पांडवों के तोमरवंशीय शासकों ने यहां 1153 ई. तक राज्य किया। इस काल में यहां भगवान पार्श्वनाथ और अन्य तीर्थंकरों के भव्य मंदिर थे। तुर्क लुटेरों से बचाने के लिए प्रतिमाओं को भूमिगत कर दिया गया। यहां किले से अष्टधातु की 57 अमूल्य प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं। सभी प्रतिमाएं 8वीं से 10वीं शताब्दी के बीच की हैं। 40 बड़े आकार की और  17 छोटे आकार की मूर्तियां हैं। 19 प्रतिमाएं भगवान पार्श्वनाथ की अति सुंदर एवं मनोहारी हैं। प्राचीन बड़ा मंदिर 350 वर्ष पूर्व बना है।

श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र, कुंडलगिरि

दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र, कुंडलगिरि यहां कुल 10 मंदिर हैं। जिनका पूर्णतया जीर्णाेद्धार किया गया है। गर्भ मंदिर अतिशय संपन्न है। इस मंदिर में सहस्रकूट चैत्यालय भी है। नंदीश्वर जिनालय भी दर्शनीय हैं। मूलनायक भगवान विघ्नहर चिंतामणी पारसनाथजी की अतिशयपूर्ण प्रतिमा मनोकामना पूर्ण करने वाली विराजित है। प्रतिवर्ष पर्यूषण समाप्ति के बाद प्रथम रविवार को वार्षिक मेला लगता है। यह क्षेत्र विंध्यांचल पर्वतमाला के कैमोर भांडेर पहाड़ियों की तलहटी एवं हिरन सरिता के तट पर स्थित है।

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