जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी का गर्भ कल्याणक 27 अक्टूबर सोमवार को मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन मनाया जाता है। इस दिन देशभर के दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान के गर्भकल्याणक पर विविध धार्मिक क्रियाएं संपन्न की जाएंगी। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष प्रस्तुति में उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित जानकारी आज पढ़िए…
इंदौर। जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी का गर्भ कल्याणक 27 अक्टूबर सोमवार को मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन मनाया जाता है। इस दिन देशभर के दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान के गर्भकल्याणक पर विविध धार्मिक क्रियाएं संपन्न की जाएंगी। पूजन, विधान और अभिषेक, शांतिधारा, अष्टद्रव्य सहित अर्घ्य अर्पित किएं जाएंगे। जैन धर्म के ग्रंथों में वर्णित जानकारी के अनुसार 22वें तीर्थंकर नेमिनाथ के पूर्व भव में राजपुत्र चिंतागति: पुष्करार्ध द्वीप के पश्चिम सुमेरु की पश्चिम दिशा में सीतोदा महानदी के उत्तर तट पर गंधिल महादेश के विजयार्ध पर्वत की उत्तर श्रेणी में सूर्यनगर के स्वामी सुर्यप्रभ व उनकी स्त्री धारिणी के पुत्र थे चिंतागति। चिंतागति ने मेरुपर्वत की तीन प्रदक्षिणा में जीत हासिल कर प्रीतिमति को छोटे भाई से विवाह करने को कहा। पर प्रीतिमति (बाद में एक भव में बनी राजुल)ने उस विवाह से इंकार कर आर्यिका दीक्षा ली। .चिंतागति ने दोनो भाइयों के साथ दीक्षा लेकर समाधिपूर्वक मरण प्राप्त कर चौथे स्वर्ग में वे देव हुए। राजा अपराजित: चारणऋध्दिधारी दो मुनिराजों से आगे पांचवे भव में अपने तीर्थंकर की होने की बात सुन राजा अपराजित ने अपने पुत्र को राज्य देकर प्रायोपगमन संन्यास विधि से मरण कर सोलहवें स्वर्ग में अच्युतेंद्र पद पाया। अच्युतेंद्र: 16 वे स्वर्ग में पुण्यात्मा ने दिव्य भोगों का अनुभव किया। राजा सुप्रतिष्ठ: मुनिराज यशोधर को आहारदान देकर सुप्रतिष्ठ ने पंचाश्चर्य प्राप्त किए। आगे जैनेश्वरी दीक्षा लेकर ग्यारह अंग और चौदह पूर्वाे का उन्होंने अध्ययन किया। सर्वतोभद्र, सिंहनिष्क्रिडित जैसे अनेकों व्रतों का उन्होंने अनुष्ठान किया। सुप्रतिष्ठ मुनिराज ने सोलहकारण भावनाओं द्वारा तीर्थंकर नाम कर्म का बंध किया। अहमिंद्र: सुप्रतिष्ठ मुनिराज ने आयु के अंत में समाधिमरण से प्राण त्यागकर जयंत नामक अनुत्तर विमान में अहमिन्द्र पद पाया। वहां तैतीस सागर की उनकी आयु थी और एक हाथ ऊंचा शरीर था।
तीर्थंकर श्री नेमिनाथ भगवान का परिचय
पिता-यादव वंशी राजा समुद्रविजय, माता-रानी शिवादेवी,
नारायण श्रीकृष्ण के चचेरे भाई श्री अरिष्टनेमि तीर्थंकर,
जन्मस्थान-द्वारावती नगरी, जयंत विमान के अहमिंद्र अवतीर्ण, गर्भ कल्याणक तिथि-कार्तिक शुक्ल 6, गर्भनक्षत्रः उत्तराषाढा,
तीर्थंकर के गर्भ कल्याणक महोत्सव में तीर्थंकर के माता के आंगनमे तीर्थंकर के गर्भ में आने से 6 माह पहले से तीर्थंकर के जन्म तक 15 माह प्रतिदिन 4 बार कुबेर द्वारा रत्नवृष्टि की गई। गर्भ से पूर्व जिनमाता को सूचक 14 स्वप्न दिखाई दिए।
गर्भस्थ तीर्थंकर शिशु की इंद्रादि देवोंद्वारा स्तुति की गई। तीर्थंकर के माता-पिता को प्रणाम और जन्मनगरीकी परिक्रमा की गई। दीक्कुमारी देवियों द्वारा जिनमाता की सेवा, मनोरंजन आदि उत्सव, आराधना हुई। भगवान नेमिनाथ जी का गर्भ कल्याणक शौरीपुर में हुआ था, जब वे रात्रि के पिछले प्रहर में उत्तराषाढ नक्षत्र में माता शिवा देवी के गर्भ में अवतीर्ण हुए थे। इस शुभ अवसर पर माता ने 14 स्वप्न देखे थे और उन्हें 15 महीनों तक प्रतिदिन कुबेर द्वारा रत्नवृष्टि का अनुभव हुआ। भगवान के जन्म के बाद उनका नाम ‘अरिष्टनेमि’ रखा गया।













Add Comment