जैन धर्म के 18वें तीर्थंकर भगवान अरहनाथ का तप कल्याणक 30 नवंबर को मनाया जाएगा। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों, चैत्यालयों में भगवान का विशेष पूजन, आराधना और विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। तिथि के अनुसार भगवान अरहनाथ का तप कल्याणक मार्गशीर्ष शुक्ल दशमी के दिन आता है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्र्ंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति…
इंदौर। जैन धर्म के 18वें तीर्थंकर भगवान अरहनाथ का तप कल्याणक 30 नवंबर को मनाया जाएगा। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों, चैत्यालयों में भगवान का विशेष पूजन, आराधना और विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। तिथि के अनुसार भगवान अरहनाथ का तपकल्याणक मार्गशीर्ष शुक्ल दशमी के दिन आता है। तप कल्याणक के बारे में जैन धर्म ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि तप कल्याणक वह अवसर है जब उन्होंने 21 हजार वर्ष तक राज्य करने के बाद 42 हजार वर्ष की आयु पूरी कर सांसारिक जीवन का त्याग कर दिया था। उन्होंने आम्र वृक्ष के नीचे रेवती नक्षत्र में दीक्षा ली और 12 सभाओं से घिरे हुए समवशरण में 20 हजार 984 वर्ष तक केवली के रूप में रहे। भगवान अरनाथ ने राज-पाट का त्याग करके दीक्षा धारण की। उन्होंने आम्र वृक्ष के नीचे रेवती नक्षत्र में जैन दीक्षा धारण की। दीक्षा लेने से पहले उन्होंने एक माह तक तेला का नियम (तीन दिन उपवास) का पालन किया।
भगवान अरनाथ के दीक्षा धारण करने पर चक्रपुर नगर के राजा अपराजित को आहारदान देने से पंचाश्चर्य प्राप्त हुए। यह भगवान अरहनाथ जी के पांच कल्याणकों में से एक है, जिसमें वह सांसारिक मोह-माया का त्याग कर आत्म-साधना के पथ पर अग्रसर हुए थे। तप कल्याणक के बाद भगवान अरहनाथ केवली ने अवस्था के दौरान छद्मस्थ अवस्था के 16 वर्ष पूरे होने के बाद आम्रवन के नीचे केवल ज्ञान प्राप्त किया। उनके समवशरण में 30 गणधर, 50 हजार मुनि, 60 हजार आर्यिकाएं, 1 लाख 60 हजार श्रावक, 3 लाख श्राविकाएं, असंख्यात देव-देवियां और संख्यात तिर्यंच शामिल थे। केवल ज्ञान के बाद उन्होंने 20 हजार 984 वर्ष तक केवली अवस्था में व्यतीत किए। चैत्र कृष्ण अमावस्या के दिन रेवती नक्षत्र में रात्रि के पूर्व भाग में सम्मेदशिखर पर सिद्धपद को प्राप्त हुए।













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