जैन पुराणों के जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव यानी भगवान आदिनाथ हैं। वह सुसीमा नगरी के राजा नाभिराय के पुत्र थे। ऋषभदेव ने ही आमजन को छह क्रियाएं असि, मषि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प का ज्ञान दिया। यही नहीं ऋषभदेव ने ही सर्वप्रथम अपनी दो पुत्रियों को लिपिविद्या और अंकविद्या का ज्ञान दिया। इस प्रकार भगवान ऋषभदेव जीचन में कर्म की प्रधानता और समाज में स्त्री शिक्षा के जनक के रूप में जाने जाते हैं। ऋषभदेव जयंती पर आइए जानते हैं, उनके जीवन के बारे में… । रेखा संजय जैन की विशेष रिपोर्ट
ऋषभदेव का गर्भावतार
एक दिन रात्रि के पिछले प्रहर में रानी मरुदेवी ने ऐरावत हाथी, शुभ्र बैल, हाथियों द्वारा स्वर्ण घटों से अभिषिक्त लक्ष्मी, पुष्पमाला आदि सोलह स्वप्न देखे। उनके पति राजा नाभिराय ने जब स्वप्नों का अर्थ बताया तो मरुदेवी बहुत हर्षित हुईं। आषाढ़ कृष्ण द्वितीया के दिन उत्तराषाढ़ नक्षत्र में भगवान ऋषभदेव, मरुदेवी के गर्भ में अवतीर्ण हुए।
ऋषभदेव का जन्म महोत्सव
माता मरुदेवी ने चैत्र कृष्ण नवमी के दिन सूर्योदय के समय भगवान को जन्म दिया। सारे विश्व में हर्ष की लहर दौड़ गई। सौधर्म इन्द्र ने इन्द्राणी सहित ऐरावत हाथी पर चढ़कर नगर की प्रदक्षिणा की और भगवान को सुमेरु पर्वत पर ले जाकर 1008 कलशों में भरे क्षीरसमुद्र के जल से जन्माभिषेक किया। उनका नाम अनन्तर वस्त्राभरणों से अलंकृत करके ‘ऋषभदेव’ नाम रखा गया।
ऋषभदेव का विवाहोत्सव
भगवान् के युवावस्था में प्रवेश करने पर महाराजा नाभिराज ने कच्छ, सुकच्छ राजाओं की बहन ‘यशस्वती’ और ‘सुनन्दा’ के साथ श्री ऋषभदेव का विवाह सम्पन्न कर दिया।
भरत चक्रवर्ती आदि का जन्म
यशस्वती देवी ने चैत्र कृष्ण नवमी के दिन भरत चक्रवर्ती को जन्म दिया। इसके बाद निन्यानवे पुत्र एवं ब्राह्मी कन्या को जन्म दिया। उनकी दूसरी रानी सुनन्दा महादेवी ने भगवान बाहुबली और सुन्दरी नाम की कन्या को जन्म दिया।
असि-मषि आदि षट्क्रियाओं का उपदेश
यह वह समय था जब प्रजाजन अपनी आवश्यकताएं कल्पवृक्षों से पूरी करते थे, लेकिन काल के प्रभाव से जब कल्पवृक्ष शक्तिहीन हो गए। इस समय ऋषभदेव ने प्रजा को असि, मषि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प इन छह कर्मों का उपदेश दिया। उन्होंने ही क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन तीन वर्णों की स्थापना की और आजीविका के अनेकों पापरहित उपाय बताए।
भगवान का वैराग्य और दीक्षा महोत्सव
एक दिन सभा में नर्तकी नीलांजना की नृत्य के दौरान ही मृत्यु हो गई। यह देख कर भगवान को वैराग्य हो गया। भगवान ने भरत का राज्याभिषेक करते हुए इस पृथ्वी को ‘भारत’ नाम दिया और बाहुबली को युवराज पद पर स्थापित किया। इसके बाद वे ‘सिद्धार्थक’ वन में पहुंचे और वटवृक्ष के नीचे बैठकर ‘ओम नमः सिद्धेभ्यः मन्त्र का उच्चारण कर पंचमुष्टि केशलोंच करके सर्व परिग्रह रहित मुनि हो गये।
भगवान का आहार ग्रहण
भगवान छह महीने बाद आहार को निकले परन्तु चर्याविधि किसी को मालूम न होने के कारण आहार नहीं हो पाया। एक वर्ष उनतालीस दिन बाद भगवान हस्तिनापुर नगर में पहुंचे। यहां राजा श्रेयांस ने भगवान को इक्षुरस का आहार दिया। वह दिन वैशाख शुक्ला तृतीया का था जो आज भी ‘अक्षय तृतीया’ के नाम से प्रसिद्ध है।
भगवान को केवलज्ञान की प्राप्ति
हजार वर्ष तक तपस्या करने के बाद भगवान को पूर्वतालपुर के उद्यान में-प्रयाग में वटवृक्ष के नीचे ही फाल्गुन कृष्णा एकादशी के दिन केवलज्ञान हो गया। इन्द्र की आज्ञा से कुबेर ने बारह योजन प्रमाण समवसरण की रचना की। पुरिमताल नगर के राजा श्री ऋषभदेव भगवान के पुत्र वृषाभसेन प्रथम गणधर हुए। ब्राह्मी भी आर्यिका दीक्षा लेकर आर्यिकाओं में प्रधान गणिनी हो गयीं।
भगवान ऋषभदेव का निर्वाण
जब भगवान की आयु चैदह दिन शेष रह गई तब कैलाश पर्वत पर जाकर माघ कृष्ण चतुर्दशी के दिन सूर्योदय के समय भगवान पूर्व दिशा की ओर मुंह करके मुनियों के साथ सिद्धलोक में जाकर विराजमान हो गये।
नाम : आदिनाथ
पिता का नाम : नाभिराय
माता का नाम : मरूदेवी
कुल : इक्ष्वाकु वंश
गर्भ कल्याण स्थान : अयोध्या
तिथि : आषाढ़ बदी द्वितीय
नक्षत्र : रोहिणी
जन्म कल्याण स्थान : अयोध्या
तिथि : चेत्र बदी छठ
नक्षत्र : उत्तराषाढ़
राशि : धनु
चिह्न(लक्षण) : बैल
वर्ण : स्वर्ण
शरीर की ऊंचाई : 500 धनुष
दीक्षा कल्याण :
वैराग्य का कारण : नीलांजना की मृत्यु होना
वन : सिद्धार्थ
वृक्ष : वटवृक्ष
कितने राजाओ ने संग दीक्षा ली : 4000
उपवास का नियम : 6 मास
प्रथम आहार दीक्षा के कितने दिन बाद : 404
स्थान : हस्तिनापुरी
आहार देने वाले राजा का नाम : श्रेयांस
आहार की वस्तु : गन्ने का रस
केवलज्ञान से पूर्व उपवास : 8
केवलज्ञान कल्याण तिथी : फाल्गुन बदी एकादशी
समय : प्रातः काल
नक्षत्र : उत्तराषाढ़
स्थान : पुरियाताल पूरी
समवशरण विस्तार (योजन में) : 12
विस्तार (कोस में) : 48
कुल गणधर : 84
मुख्य गणधर : वृषभसेन
मुख्य आर्यिका : ब्राम्हीजी
मुख्य श्रोता : भरत चक्रवर्ती
मुख्य यक्ष : गोमुख (गोवदन)
मुख्य यक्षिणी : चक्रेश्वरी
मोक्ष कल्याण तिथि : माघ बदी चतुर्दशी
समय : सूर्योदय
स्थान : कैलाश गिरी
विशिष्ठ स्थान नक्षत्र : उत्तराषाढ़
आसन : पद्मासन









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