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भगवान अभिनंदननाथ जी ज्ञान कल्याणक 2 जनवरी को : तिथि के अनुसार पौष शुक्ल चतुर्दशी को है 


जैन धर्म के तीर्थंकर भगवान अभिनंदननाथ जी का ज्ञान कल्याणक 2026 में 2 जनवरी को आ रहा है। इस दिन शहर के विभिन्न दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान अभिनंदननाथजी की पूजा, आराधना और अभिषेक आदि विधि विधान से होगी। भगवान का ज्ञान कल्याणक पौष शुक्ल चतुर्दशी को मनाया जाता है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में नववर्ष की यह पहली प्रस्तुति। संकलन और संपादन उपसंपादक प्रीतम लखवाल के माध्यम से। 


इंदौर। जैन धर्म के तीर्थंकर भगवान अभिनंदननाथ जी का ज्ञान कल्याणक 2026 में 2 जनवरी को आ रहा है। इस दिन शहर के विभिन्न दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान अभिनंदननाथजी की पूजा, आराधना और अभिषेक आदि विधि विधान से होगी। भगवान का ज्ञान कल्याणक पौष शुक्ल चतुर्दशी को मनाया जाता है। जैन धर्म ग्रंथों में वर्णित है कि अयोध्या नगरी में इक्ष्वाकु वंशीय महाराज संवर राज करते थे। उनकी रानी का नाम सिद्धार्था देवी था। एक रात्रि में महारानी ने 14 स्वपन देखे। भविष्य वेत्ताओ से स्वपन फ़ल प्रच्छा की गई। उन्होने स्पष्ट किया कि महारानी एक ऐसे तेजस्वी पुत्र को जन्म दंेगी, जो या तो चक्रवर्ती सम्राट होगा अथवा धर्मतीर्थ का संस्थापक तीर्थंकर होगा। स्वप्न फ़ल जानने के बाद सभी ओर हर्ष व्याप्त हो गया। एक अन्य विशेष प्रभाव यह हुआ कि राजपरिवार सहित समस्त नागरिकों में पारस्परिक अभिवादन अभिनंदन रूपी सदगुण का अतिशय विकास हुआ। सभी ने इसे महारानी के गर्भस्थ पुण्यशाली जीव का प्रभाव माना। माघ शुक्ल द्वितीया को महारानी ने एक तेजस्वी शिशु को जन्म दिया। देवों और मानवों ने प्रभु का जन्मोत्सव मनाया। नामकरण की वेला में महाराज ने घोषणा की कि हमारे पुत्र के गर्भ मे आते ही सर्वत्र अभिवादन-अभिनंदन के सदगुण का प्रसार हुआ। इसलिए इसका नाम अभिनंदन रखा जाता है।

देवताओं ने कैवल्य महोत्सव मनाया

अभिनंदन कालक्रम से युवा हुए। तदंतर इन्होने राज्य का संचालन भी किया। इनके कुशल शासन में सर्वत्र सुख, सम्रद्धि और न्याय की वृद्धि हुई। कालंतर में पुत्र को राजपद प्रदान कर अभिनंदननाथ ने प्रव्रजया अंगीकार की। 18 वर्षों तक प्रभु छ्दमस्थ अवस्था में रहे। इसके बाद पौष शुक्ल चतुर्दशी के दिन प्रभु ने केवल ज्ञान प्राप्त किया। देवताओं ने उपस्थित हो कैवल्य महोत्सव मनाया एवं समवसरण की रचना की। प्रभु ने धर्माेपदेश दिया। हजारों लोगों ने साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका धर्म को अंगीकार किया। इस प्रकार चतुर्विध तीर्थ की स्थापना हुई। सुदीर्घ काल तक भव्य प्राणियों को धर्मामृत का पान कराने के बाद वैशाख शुक्ल अष्टमी को सम्मेद शिखर से भगवान मोक्ष पधारे।

भगवान के धर्म परिवार का विवरण 

वज्रनाभि आदि 116 गणधर, तीन लाख श्रमण, 6 लाख 30 हजार श्रमणियां, 2 लाख 88 हजार श्रावक एवं 5 लाख 27 हजार श्राविकाएं।

भगवान के चिन्ह का महत्व

बंदर-यह भगवान अभिनंदननाथ का चिन्ह है। बंदर का स्वभाव चंचल होता है। मन की चंचलता की तुलना बंदर से की जाती है। हमारा मन जब भगवान के चरणों में लीन हो जाता है तो वह भी संसार में वंदनीय बन जाता है। श्रीराम का परम भक्त हनुमान वानर जाति में जन्म लेता है। अपने चंचल मन को स्थिर करके प्रभु के चरणों में मन लगाने से वह पूजनीय बन गया। इसी प्रकार हम भी तीर्थंकर अभिनंदननाथ जी के चरणों में मन लगाने से अभिनंदनीय वंदनीय बन सकते हैं।

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