भगवान अभिनंदननाथजी का गर्भ एवं मोक्ष कल्याणक 2 मई को मनाया जाएगा। भगवान का गर्भ और मोक्ष कल्याणक को लेकर देश के सिद्ध और अतिशय तीर्थ क्षेत्र के अलावा नगरों, कस्बों आदि के जिनालय और चैत्यालयों में विशेष धार्मिक कार्यक्रम किए जाएंगे। भगवान का गर्भ और मोक्ष कल्याणक तिथि के अनुसार वैशाख शुक्ल छठ के दिन मनाया जाता है। इस दिन अभिषेक, शांतिधारा, पूजन और निर्वाण कांठ पाठ के अलावा निर्वाण लाडू चढ़ाने के लिए जैन समाज के लोग जुटेंगे। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उप संपादक प्रीतम लखवाल की स्पेशल रिपोर्ट…
इंदौर। जैन धर्म के चौथे तीर्थंकर भगवान अभिनंदननाथ हैं। इनका गर्भ कल्याणक के साथ ही मोक्ष कल्याण एक ही तिथि वैशाख शुक्ल सप्तमी के दिन आता है। इस दिन भगवान ने अपनी माता के गर्भ में प्रवेश किया तो इस दिन भगवान ने मोक्ष को गमन किया। भगवान अभिनंदननाथ जी विजय नाम के अनुत्तम विमान से गर्भ में आए और वह दिन वैशाख छठ था। जैन धर्म के पुराणों के अनुसार भगवान अभिनंदन नाथ ने भगवान माघ शुक्ल द्वादशी को पुनर्वसु नक्षत्र में जन्म लिया। धर्मग्रंथों में वर्णित जानकारी के अनुसार भगवान अभिनंदननाथ का कुमार काल साढ़े 12 लाख वर्ष पूर्व का था। उन्होंने साढ़े 36 लाख वर्ष पूर्व अथवा 8 पूर्वांग तक राज्य किया। इस दिन जैन समाज के लोग भक्ति भाव से भरे हुए उनका पूजन, अभिषेक और शांतिधारा, निर्वाण कांड का पाठ, निर्वाण लाडू चढ़ाने सहित अन्य मंगल धार्मिक क्रियाएं करते हैं। भगवान अभिनंदननाथ जी ने जैन धर्म के सिद्धांतों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए कई प्रांतों और देशों में विहार किया और अपने उपदेशों के माध्यम से जनजागृति का कार्य किया। लोगों को धर्म की महत्ता बताते हुए। संयम,तप, साधना का मार्ग बताया। बताया जाता है कि भगवान अभिनंदननाथ जी को अभिनंदन स्वामी के नाम से भी जाना जाता है। अभिनंदननाथ स्वामी का जन्म इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रिय परिवार में माघ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को हुआ था। इससे पूर्व वे अयोध्या में माता सिद्धार्था देवी के गर्भ में वैशाख शुक्ल सप्तमी के दिन आए थे। उनके पिता राजा संवर थे। इनका वर्ण सुवर्ण और चिह्न बंदर है। इनके यक्ष का नाम यक्षेश्वर और यक्षिणी का नाम व्रज श्रृंखला था।
अपने पिता की आज्ञा से अभिनंदननाथ जी ने राज्य का संचालन भी किया, लेकिन उनका सांसारिक जीवन से मोह भंग हो गया। भगवान अभिनंदननाथ का पूर्व पर्याय में नाम महावल राजा था। वे मंगलावती देश के राजा थे तथा पूर्व पर्याय में रत्न संचयपुर नगर के राजा रहे थे। उनके पूर्व पर्याय के पुत्र श्री धनपाल जी थे। उन्होंने पूर्व पर्याय में विमल वाहन नाम के मुनिराज से दीक्षा ग्रहण की। यहां ग्रंथों में वर्णित जानकारी के अनुसार भगवान अभिनंदननाथ जी को गंधर्व नगर का नाश देखकर वैराग्य हुआ था। उन्होंने माघ शुक्ल 12 को दीक्षा ग्रहण की। अभिनंदननाथ भगवान ने अंत में सम्मेदशिखर पर पहुंचकर एक महीने का प्रतिमायोग लेकर वैशाख शुक्ल सप्तमी के दिन प्रातःकाल के समय अनेक मुनियों के साथ मोक्ष प्राप्त किया।













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