स्वाध्याय मात्र स्वाध्याय नहीं,अपितु तप है। अपने स्वभाव में रहना ही वास्तविक सुख है। परम पारणामिक भाव आने पर हम अपने स्वभाव में आ सकते हैं। जब हम शरीर की वेदना का अनुभव नहीं बता सकते तो फिर आत्मा के अनुभव को कैसे बयां कर सकते हैं? राग दो प्रकार का होता है शुभ और अशुभ। यह बात मुनि श्री मुनि सागर जी ने धर्मसभा में कही। पढ़िए यह रिपोर्ट…
इंदौर। स्वाध्याय मात्र स्वाध्याय नहीं,अपितु तप है। अपने स्वभाव में रहना ही वास्तविक सुख है। परम पारणामिक भाव आने पर हम अपने स्वभाव में आ सकते हैं। जब हम शरीर की वेदना का अनुभव नहीं बता सकते तो फिर आत्मा के अनुभव को कैसे बयां कर सकते हैं? राग दो प्रकार का होता है शुभ और अशुभ। स्वाध्याय भी राग हैं, परंतु यह शुभ व प्रशस्त राग है। हमें पुण्य से नहीं अपितु राग से डरना चाहिए। संसार में जो भी सहयोगी संबंध है, पुण्य कर्म के फल हैं, धर्म के फल नहीं है।
जो साधन है उसे साधना कर सकते हैं, परंतु उसको साध्य मानना हमारी भूल है। हम ऐसे अच्छे कर्म करें जिससे हमें अनुकूल वातावरण मिले। जिसको वस्तु स्वरूप का ज्ञान है वह प्रतिकूलता में भी समता भाव रखता है। आत्मा न तो कारण है, न कार्य है, आत्मा तो आत्मा है। यह विचार नेमी नगर जैन कॉलोनी में प्रवचन के दौरान मुनि श्री मुनि सागर जी महाराज ने व्यक्त किए। मंत्री गिरीश पाटौदी ने बताया कि धर्म सभा का संचालन एवं मंगलाचरण किरण बड़जात्या ने किया। आभार अध्यक्ष कैलाश लुहाडिया ने व्यक्त किया।













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